इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अदालतों में लंबित मुकदमों के बोझ के लिए सरकार और पुलिस की ढुलमुल कार्यशैली को जिम्मेदार ठहराया है। कोर्ट ने फिल्म दामिनी के संवाद का जिक्र करते हुए कहा कि अदालतों पर लगा तारीख पर तारीख का दाग तब तक नहीं हटेगा, जब तक सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली नहीं सुधरेगी।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की अदालत ने आगरा के मेवालाल की जमानत अर्जी नामंजूर कर दी। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि अदालतों में लंबित मुकदमों की समस्या का कारण प्रशासनिक कमियां हैं। ट्रायल कोर्ट में पेशकार, आशुलिपिक और अन्य अनुसचिवीय कर्मचारियों की बड़ी कमी है। इस कारण एक-एक लिपिक हजारों फाइलों का बोझ संभाल रहा है। उधर, पुलिस अदालती समन और वारंट समय पर तामील करने में विफल हो रही है। गवाहों और पुलिस अधिकारियों का अदालत में पेश न होना देरी का एक बड़ा कारण है।
कोर्ट ने यह आदेश भी दिया कि जिला पुलिस प्रमुखों और कमिश्नरों को जिला जज की अध्यक्षता वाली मॉनिटरिंग सेल की बैठकों में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा, क्योंकि उनकी अनुपस्थिति न्यायिक प्रोटोकॉल का अपमान है।
आधुनिक मशीनों की कमी, रिपोर्ट आने में लगता है समय
कोर्ट ने कहा सच्चाई यह है कि एक न्यायाधीश तब तक मामले का फैसला नहीं कर सकता जब तक पुलिस अभियुक्तों और गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित न करे। समय पर सही फॉरेंसिक रिपोर्ट उपलब्ध न कराई जाए। इन्हीं तमाम वजहों से देरी होती है और तारीख पर तारीख एक धारणा बन गई है।
कोर्ट ने पाया कि फॉरेंसिक लैब की स्थिति दयनीय है। वहां आधुनिक मशीनों और स्टाफ की कमी के कारण रिपोर्ट आने में लंबा समय लगता है। वर्तमान में यूपी की फॉरेंसिक लैब पुलिस विभाग का हिस्सा हैं, जिससे वे प्रशासनिक और वित्तीय रूप से स्वतंत्र नहीं हैं। इसलिए कोर्ट ने इन्हें गृह मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त विभाग बनाने का सुझाव दिया है।