अधिग्रहण की कोई योजना नहीं थी
कन्यावती ने बरेली में जमीन खरीदी थी। राजस्व अभिलेख में उनकी जमीन के दक्षिण छोर पर चकरोड दर्ज था। सड़क के चौड़ीकरण के नाम पर पीडब्ल्यूडी ने उनकी जमीन कब्जा ली। मुआवजा भी नहीं दिया। सूचना के अधिकार (आरटीआई) से पता लगा कि उनकी जमीन अधिग्रहण की कोई योजना ही नहीं थी। याची ने भूमि अधिग्रहण प्राधिकारी से जब इस पर पत्र लिखकर पूछा तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद याची ने हाईकोर्ट का रुख किया। पहली बार कोर्ट ने याचिका निस्तारित करते हुए डीएम बरेली को मुआवजा निर्धारित करने का आदेश दिया।
भूमि अधिग्रहण समिति ने मुआवजा देने से कर दिया था इन्कार
भूमि अधिग्रहण समिति ने याची का दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि शुरू में चक रोड तीन मीटर चौड़ी है और दोनों तरफ ढाई मीटर अतिरिक्त जगह उपलब्ध है। लिहाजा, सड़क को 1.25 मीटर चौड़ा करने से याची के व्यक्तिगत अधिकार हनन नहीं होता है। समिति ने मुआवजा देने से भी मना कर दिया। इस आदेश के खिलाफ कन्यावती ने दोबारा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने तहसीलदार की रिपोर्ट में पाया कि करीब 20 साल पहले इस चक रोड को गन्ना विकास विभाग ने बिना किसी जमीन के अधिग्रहण के बनाया था। फिर, पीडब्ल्यूडी ने अधिग्रहण प्रक्रिया के बिना याची की भूमि का कुछ हिस्सा लेकर चौड़ा कर दिया।
बिना प्रक्रिया के जमीन लेना संविधानिक अधिकारों का हनन
हाईकोर्ट ने कहा, कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से बेदखल नहीं किया जा सकता। संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार ही नहीं, बल्कि संविधानिक अधिकार भी है। असल में यही मानवाधिकार की भी धुरी है।