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हाईकोर्ट सख्त : हिरासत में आरोपी को मारना-पीटना पुलिस की ड्यूटी का हिस्सा नहीं, पुलिसकर्मियों की याचिका खारिज

Sat, 12 Sep 2026 01:45 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

Allahabad High Court : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिरासत में आरोपी को बांधकर पीटने के मामले में सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को हिरासत में पीटना पुलिस के आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं है और ऐसे गंभीर अपराध को ड्यूटी के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को हिरासत में पीटना पुलिस के आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं है। यह गंभीर अपराध है, जिसे ड्यूटी के नाम पर माफ नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने बांदा में तैनात रहीं शिवानी जोशी समेत दो अन्य पुलिसकर्मियों की उन्मोचन प्रार्थना पत्र (डिस्चार्ज एप्लीकेशन) खारिज करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है। मामला बांदा के बबेरू थाना क्षेत्र का है।

आरोप है कि मई 2022 में एक मुकदमे की जांच के दौरान नोटिस लेकर घर पहुंचे पुलिसकर्मियों के साथ आरोपी पक्ष ने मारपीट की। साथ ही उनके सरकारी कागजात और नोटिस फाड़ दिए गए। इसके बाद पुलिस ने गांव के चार लोगों को हिरासत में ले लिया। इनमें महिलाएं भी शामिल थीं। हिरासत में लिए गए लोगों के परिजनों की ओर से पुलिस पर हिरासत के दौरान हिंसा, छेड़छाड़ और लूटपाट के आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया गया।

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आरोप लगाया गया कि पुलिस ने शिकायतकर्ता और उनके परिवार के सदस्यों के हाथ-पैर बांधकर पिटाई की। इससे उनके कूल्हे, जांघ, छाती और शरीर के अन्य हिस्सों में चोट व सूजन आई। इसकी पुष्टि मेडिकल रिपोर्ट में भी हुई। इसके बाद पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया। आरोप तय होने से पहले पुलिसकर्मियों ने ट्रायल कोर्ट में उन्मोचन प्रार्थना पत्र दाखिल किया।

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कोर्ट ने कहा- पुलिसकर्मियों ने पार की अपनी सीमा

पुलिसकर्मियों की ओर से दलील दी गई कि घटना पुलिस के कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान हुई थी। इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सीआरपीसी की धारा 197 के तहत सक्षम प्राधिकारी से मंजूरी लेना जरूरी है। ट्रायल कोर्ट ने इन तर्कों को मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट ने कहा कि हिरासत में किसी व्यक्ति को बांधकर बार-बार पीटना आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं हो सकता। इसे यह कहकर भी सही नहीं ठहराया जा सकता कि जांच के दौरान पुलिसकर्मियों ने केवल अपनी सीमा थोड़ी पार कर दी थी।

रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी पुलिसकर्मियों ने पहले भी संज्ञान और समन आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था। हालांकि, आठ फरवरी 2024 को सक्षम अदालत के समक्ष पेश होने और जमानत अर्जी दाखिल करने की अनुमति लेकर उन्होंने वह याचिका वापस ले ली थी।

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