लिखित कारण बताएं बिना गिरफ्तारी हुई तो पुलिस अधिकारी नपेंगे। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर के रिमांड मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द कर दिया है। साथ ही डीजीपी को सर्कुलर जारी करने का आदेश दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी प्रक्रिया के खोखले और औपचारिक अनुपालन पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि लिखित कारण बताए बिना की गई कोई भी गिरफ्तारी अवैध होगी। गिरफ्तारी के संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करने वाले पुलिस अधिकारियों को निलंबन और विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।
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यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने उमंग रस्तोगी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर के रिमांड मजिस्ट्रेट की ओर से पारित आदेश को रद्द करते हुए आरोपी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। साथ ही डीजीपी को एक हफ्ते में सर्कुलर जारी करने का निर्देश भी दिया है।
मामला गौतमबुद्ध नगर के बिसरख थाना क्षेत्र से जुड़ा है। याची उमंग के हल्द्वानी निवासी पिता को 28 नवंबर को बिसरख पुलिस ने दिल्ली के लक्ष्मी नगर इलाके से गिरफ्तार कर पांच दिनों तक थाने में रखा। इसके बाद चोरी की संपत्ति की खरीद-फरोख्त का मुकदमा दर्ज कर उन्हें रिमांड मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया।
इसके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई। इससे नाराज पुलिस ने याची उमंग रस्तोगी को भी हल्द्वानी से 26 दिसंबर को बिना कारण बताए गिरफ्तार कर लिया। उसे 27 दिसंबर को गौतमबुद्धनगर के सूरजपुर जिला अदालत में रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया।
उसी दिन याची ने रिमांड मजिस्ट्रेट की अदालत में रिमांड मजिस्ट्रेट की रिहाई की अर्जी दी। जो खारिज कर दी गई। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले में डीजीपी को एक सप्ताह के भीतर सभी पुलिस आयुक्तों, एसएसपी और एसपी को सर्कुलर जारी कर गिरफ्तारी नियमों के अनुपालन का दो टूक निर्देश जारी करने का आदेश दिया है।
कहा कि गिरफ्तारी का कारण बताना सांविधानिक जिम्मेदारी है, पुलिस की मर्जी नहीं है। भविष्य में गिरफ्तारी के समय यदि मेमो के नियमों का उल्लंघन पाया गया तो संबंधित अधिकारी को दुराचरण का दोषी मानकर तत्काल निलंबित किया जाए।
याची की दलील
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि गिरफ्तारी के वक्त पुलिस ने गिरफ्तारी मेमो की प्रति नहीं दी। इस तथ्य को रिमांड मजिस्ट्रेट की अदालत ने अनदेखा कर रिहाई की मांग खारिज कर दी। यह गिरफ्तारी नियमों का उल्लंघन है।
कानून का खोखला अनुपालन निंदनीय
सुनवाई के दौरान पुलिस ने गिरफ्तारी मेमो पेश किया। इसमें कोर्ट ने पाया कि मेमो के खंड 13 में गिरफ्तारी का स्पष्ट कारण नहीं दर्शाया गया है। इससे खफा कोर्ट ने कहा कि कानून का खोखला अनुपालन और उसे अदालत में जायज ठहराने की कोशिश निंदनीय है। यह पुलिस कर्मियों के कर्तव्य की अवहेलना का स्पष्ट प्रमाण है।
मजिस्ट्रेट पर भी तल्ख टिप्पणी
अदालत ने केवल पुलिस ही नहीं, रिमांड मजिस्ट्रेट की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। कहा कि मजिस्ट्रेट का यह कर्तव्य है कि वह रिमांड देने से पहले खुद को संतुष्ट करे कि गिरफ्तारी की सांविधानिक और कानूनी प्रकिया का पालन हुआ है या नहीं। इस मामले में बिना जांचे रिमांड देना गलत था।
बीएनएसएस के नए नियम
धारा 47: पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी के समय अपराध का पूरा विवरण देना अनिवार्य है।
धारा 48: गिरफ्तार व्यक्ति के किसी रिश्तेदार या मित्र को तुरंत सूचना देना पुलिस की जिम्मेदारी है।
धारा 37: प्रत्येक जिले में एक नामित पुलिस अधिकारी होगा, जो गिरफ्तार व्यक्तियों की जानकारी कंट्रोल रूम पर प्रदर्शित करेगा।+
क्यों है खास गिरफ्तारी मेमो का खंड-13
यही वह कॉलम है, जहां पुलिस को यह लिखना होता है कि आरोपी को गिरफ्तार करना क्यों जरूरी था? क्या वह सबूत मिटा सकता था? क्या वह भाग सकता था? हाईकोर्ट ने कहा कि इस कॉलम को खाली छोड़ना या गोल-मोल जानकारी देना अब पुलिस वालों को भारी पड़ेगा।