फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

UP : बाल विवाह पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- पर्सनल लॉ बोर्ड कानून से ऊपर नहीं

Wed, 08 Jul 2026 12:53 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाल विवाह को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (पीसीएमए) और पॉक्सो एक्ट, 2012 के प्रावधान देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं।
विज्ञापन
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बाल विवाह को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (पीसीएमए) और पॉक्सो एक्ट, 2012 के प्रावधान देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी पर्सनल लॉ, यहां तक कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) के आधार पर भी बाल विवाह को वैध नहीं ठहराया जा सकता। जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने यह टिप्पणी बुलंदशहर में दर्ज एक एफआईआर को निरस्त करने की मांग वाली 19 लोगों की याचिका खारिज करते हुए की।

18 वर्ष से कम उम्र की लड़की का विवाह कानून का उल्लंघन

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की का विवाह कराना बाल विवाह निषेध अधिनियम का सीधा उल्लंघन है। यदि ऐसे विवाह के बाद शारीरिक संबंध स्थापित होते हैं तो वे पॉक्सो एक्ट के तहत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आएंगे। इसलिए किसी भी व्यक्तिगत कानून का हवाला देकर इन कानूनों से राहत नहीं ली जा सकती।

सभी धर्मों के लिए एक समान है कानून

विज्ञापन


हाई कोर्ट ने कहा कि भारत में विवाह की न्यूनतम कानूनी उम्र सभी नागरिकों के लिए समान है। पीसीएमए और पॉक्सो जैसे कानून जनहित, वैज्ञानिक सोच और राष्ट्रीय नीति पर आधारित हैं, इसलिए किसी भी समुदाय या व्यक्ति को इनसे छूट नहीं दी जा सकती।

विज्ञापन

पुलिस और चाइल्ड लाइन की कार्रवाई को बताया उचित

मामला बुलंदशहर का है, जहां पुलिस और चाइल्ड लाइन की टीम 16 वर्षीय नाबालिग मुस्लिम लड़की का निकाह रुकवाने पहुंची थी। आरोप है कि इस दौरान टीम पर हमला किया गया और सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाई गई। इस मामले में 19 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

अदालत ने कहा कि पुलिस और चाइल्ड लाइन ने संभावित अपराध को रोकने के लिए अपना वैधानिक दायित्व निभाया और उनकी कार्रवाई कानून के अनुरूप थी।

एफआईआर रद्द करने से इनकार

खंडपीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया आरोपियों के खिलाफ सरकारी कार्य में बाधा समेत गंभीर अपराधों के पर्याप्त आधार मौजूद हैं। ऐसे में एफआईआर रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए मामले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें