गिरफ्तारी मेमो की खामियों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने मजिस्ट्रेटों के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि काम के बोझ की आड़ में मजिस्ट्रेट रिमांड नहीं दे सकते।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि काम के बोझ का हवाला देकर रिमांड मजिस्ट्रेट आननफानन आरोपी को न्यायिक या पुलिस अभिरक्षा में नहीं भेज सकते। यह न सिर्फ लापरवाही है, बल्कि आरोपी के मौलिक अधिकारों का हनन भी है।
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इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने कुशीनगर निवासी अरविंद पांडे की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार कर उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। साथ ही न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान लखनऊ के निदेशक को मजिस्ट्रेटों के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करने का आदेश भी दिया है।
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेटों से सतर्क प्रहरी की तरह काम करने की अपेक्षा की जाती है। इसके बावजूद अदालती काम में कामचलाऊ रवैया चिंताजनक है। न्यायिक कर्तव्य की ऐसी उपेक्षा पर हाईकोर्ट आंखें बंद नहीं रख सकता। कामकाज का तरीका न सुधरा तो प्रशासनिक कार्रवाई की सिफारिश भी की जा सकती है।
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मामला कुशीनगर में दर्ज साइबर धोखाधड़ी के मुकदमे से जुड़ा है। पुलिस ने याची अरविंद को गिरफ्तार कर रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। इसके बाद उसे न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया। इसके खिलाफ याची के परिजनों ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की।
गिरफ्तारी मेमो में मिलीं खामियां
कोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी मेमो में गिरफ्तारी के कारणों वाले कॉलम में केवल औपचारिक रूप से हां लिखा गया था। गिरफ्तारी की जरूरत बताने वाले विवरण, बरामद सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और संबंधित दस्तावेजों की जानकारी वाले कई कॉलम खाली थे। इसके अलावा गिरफ्तारी के गवाहों और आरोपी के निकट संबंधी का विवरण भी दर्ज नहीं था। कोर्ट ने इसे सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के विपरीत माना। पुलिस ने भी अपने जवाबी हलफनामे में मेमो की इन खामियों से इन्कार नहीं किया।
काम के बोझ का हवाला देकर मजिस्ट्रेट ने मांगी माफी, कोर्ट ने नहीं मानी दलील
हाईकोर्ट ने कुशीनगर के जिला जज से स्पष्टीकरण मांगा था। पूछा था कि गिरफ्तारी मेमो में खामियां होने के बावजूद आरोपी को रिमांड पर कैसे भेज दिया गया। संबंधित मजिस्ट्रेट ने तीन अक्तूबर 2026 को दिए स्पष्टीकरण में न्यायिक कार्य, विशेषकर जमानत अर्जियों के अत्यधिक बोझ का हवाला देते हुए गलती स्वीकार की थी। साथ ही माफी मांगी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
कहा कि रिमांड के मामलों में मजिस्ट्रेट को अपने विवेक का इस्तेमाल करना होता है। जरूरत पड़ने पर पुलिस की रिमांड अर्जी खारिज की जा सकती है। आरोपी को निजी मुचलके पर रिहा भी किया जा सकता है। उचित सतर्कता बरती जाती तो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने की जरूरत नहीं पड़ती।
कोर्ट ने कहा-पुलिस जानबूझकर करती है ऐसी गलती
कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि गिरफ्तारी मेमो में खामियों का यह कोई पहला मामला नहीं है। कई ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां गिरफ्तारी मेमो सही तरीके से भरा गया होता तो आरोपी को जमानत तक नहीं मिलती। बार-बार सामने आ रही इन गलतियों से ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस यह सब जानबूझकर कर रही है, ताकि आरोपी इस तकनीकी गलती का लाभ उठाकर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के माध्यम से कोर्ट से रिहाई का आदेश हासिल कर सके।