मंदिर पक्ष के अनुसार अधिनियम 1995 लागू होने के बाद जो संपत्तियां गैर पंजीकृत थीं या पहले पंजीकृत थीं, उन सभी को फिर से पंजीकृत करने की आवश्यकता थी। वर्तमान मामले में विवादित संपत्ति को अधिनियम 1995 के लागू होने के बाद धारा 36 के तहत आवश्यक रूप से फिर से पंजीकृत नहीं किया गया है और इसलिए विवादित संपत्ति को वक्फ संपत्ति नहीं कहा जा सकता है।
मंदिर पक्ष के अनुसार भगवान विश्वेश्वर का मंदिर प्राचीन काल से अस्तित्व में है और स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर विवादित ढांचे में स्थित हैं। इसलिए पूरी संपत्ति स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर में निहित है। उन्होंने उत्तर प्रदेश श्री काशी विश्वनाथ एक्ट 1983 के तहत दी गई परिभाषा की भी व्याख्या की। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के अयोध्या प्रसाद व सुप्रीम कोर्ट केसरदार खां केफैसले का हवाला दिया। कहा कि 18 अप्रैल 1678 को औरंगजेब के आदेश के तहत मंदिर गिराया गया। उसके बाद मंदिर को मस्जिद में रूपांतरित करने का कोई उल्लेख या रिकॉर्ड नहीं है।
पंजीकृत वक्फ संपत्ति का दोबारा पंजीकरण कराने की जरूरत नहीं
सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद फरमान अहमद नकवी ने तर्क दिया कि जो संपत्ति 1995 के अधिनियम के शुरू होने से पहले वक्फ अधिनियम के तहत पंजीकृत थी। उसे फिर से पंजीकृत करने की आवश्यकता नहीं है। नकवी ने तर्क दिया कि जहां तक उत्तर प्रदेश श्री काशी विश्वनाथ मंदिर अधिनियम 1983 का संबंध है।
वह केवल काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रबंधन के लिए है और उक्त अधिनियम का वर्तमान विवाद से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रतिवादी ने यह स्वीकार किया है कि औरंगजेब द्वारा मंदिर के ध्वस्तीकरण किए जाने के बाद मस्जिद अस्तित्व में आई और उसका अस्तित्व 15 अगस्त 1947 में भी रहा। इसलिए पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 के तहत उसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकता है।