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हाईकोर्ट : सरकारी कर्मचारी के खिलाफ एफआईआर से पहले पक्ष सुनना जरूरी, हाईकोर्ट ने रद्द किया मजिस्ट्रेट का आदेश

Sat, 12 Sep 2026 07:56 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों को लेकर अहम कानूनी व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आधिकारिक ड्यूटी से जुड़े कथित अपराध में किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ एफआईआर का आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट को उसका पक्ष सुनना अनिवार्य है। इस वैधानिक सुरक्षा का पालन नहीं करने पर गौतमबुद्ध नगर के मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द कर दिया गया।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए कथित अपराध की शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट को संबंधित कर्मचारी का पक्ष सुनना अनिवार्य है। न्यायालय ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) के तहत सरकारी कर्मचारियों को मिली सुरक्षा का पालन किए बिना एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।

यह टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर के अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम द्वारा 12 अगस्त 2026 को पारित आदेश को रद्द कर दिया। न्यायालय ने सरकारी चिकित्सक डॉ. राहुल वर्मा की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ शुरू की गई संबंधित कार्यवाही भी निरस्त कर दी।

क्या है पूरा मामला

मामला गौतमबुद्ध नगर स्थित यथार्थ अस्पताल में हुई एक सर्जरी से जुड़ा है। धीरेंद्र ने शिकायत में आरोप लगाया था कि 31 मई 2025 को उसकी पत्नी की अस्पताल में पित्ताशय की पथरी निकालने की शल्यक्रिया हुई थी। आरोप था कि शल्यक्रिया के दौरान 10 मिलीमीटर की पथरी रह गई, जिसके कारण उसकी पत्नी को लगातार दर्द होता रहा। बाद में दूसरे अस्पताल में पथरी निकाली गई। शिकायतकर्ता ने इसे चिकित्सकीय लापरवाही बताया था।

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शिकायत के बाद गौतमबुद्ध नगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने 11 जुलाई 2025 को अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. शुभ्रा मित्तल की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की। डॉ. राहुल वर्मा भी इस समिति के सदस्य थे। समिति ने संबंधित पक्षों को सुनने के बाद उपलब्ध तथ्यों और रिपोर्टों पर विचार किया और अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।शिकायतकर्ता समिति की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हुआ और उसने जिलाधिकारी के समक्ष दोबारा शिकायत की।

मजिस्ट्रेट ने दिया था एफआईआर का आदेश

इसके बाद शिकायतकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(4) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दाखिल कर डॉ. राहुल वर्मा समेत अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम, गौतमबुद्ध नगर ने 12 अगस्त 2026 को पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया। इस आदेश को डॉ. राहुल वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट में क्या दलील दी गई

याची की ओर से अधिवक्ता विभु राय ने कहा कि डॉ. राहुल वर्मा जिला संयुक्त अस्पताल, नोएडा में परामर्शदाता शल्य चिकित्सक हैं। उन्हें मुख्य चिकित्सा अधिकारी के आदेश पर गठित समिति में सदस्य बनाया गया था और वह केवल अपना आधिकारिक दायित्व निभा रहे थे।

दलील दी गई कि डॉ. वर्मा का शिकायतकर्ता की पत्नी के उपचार या उसकी शल्यक्रिया से कोई संबंध नहीं था। उनके खिलाफ चिकित्सकीय लापरवाही का कोई प्रत्यक्ष आरोप या तथ्य भी रिकॉर्ड में नहीं है। अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के ओम प्रकाश अंबाडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ आरोप पर जांच या एफआईआर का आदेश देने से पहले संबंधित कर्मचारी का पक्ष सुनना आवश्यक है।

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पक्ष सुने बिना एफआईआर का आदेश कानूनन टिकाऊ नहीं

हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 (4) (बी) का उल्लेख करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने याची से कोई जवाब नहीं मांगा और उसका पक्ष जाने बिना ही एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दे दिया। न्यायालय ने कहा कि सरकारी कर्मचारी को दी गई वैधानिक सुरक्षा का पालन नहीं किया गया।

कोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो कि डॉ. राहुल वर्मा शिकायतकर्ता की पत्नी के उपचार या शल्यक्रिया में शामिल थे अथवा उन्होंने किसी प्रकार की चिकित्सकीय लापरवाही की थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले और मामले के तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने 12 अगस्त 2026 का मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही डॉ. राहुल वर्मा के खिलाफ शुरू की गई संबंधित पूरी कार्यवाही भी निरस्त कर दी।

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