मजिस्ट्रेट ने दिया था एफआईआर का आदेश
इसके बाद शिकायतकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(4) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दाखिल कर डॉ. राहुल वर्मा समेत अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम, गौतमबुद्ध नगर ने 12 अगस्त 2026 को पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया। इस आदेश को डॉ. राहुल वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में क्या दलील दी गई
याची की ओर से अधिवक्ता विभु राय ने कहा कि डॉ. राहुल वर्मा जिला संयुक्त अस्पताल, नोएडा में परामर्शदाता शल्य चिकित्सक हैं। उन्हें मुख्य चिकित्सा अधिकारी के आदेश पर गठित समिति में सदस्य बनाया गया था और वह केवल अपना आधिकारिक दायित्व निभा रहे थे।
दलील दी गई कि डॉ. वर्मा का शिकायतकर्ता की पत्नी के उपचार या उसकी शल्यक्रिया से कोई संबंध नहीं था। उनके खिलाफ चिकित्सकीय लापरवाही का कोई प्रत्यक्ष आरोप या तथ्य भी रिकॉर्ड में नहीं है। अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के ओम प्रकाश अंबाडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ आरोप पर जांच या एफआईआर का आदेश देने से पहले संबंधित कर्मचारी का पक्ष सुनना आवश्यक है।
पक्ष सुने बिना एफआईआर का आदेश कानूनन टिकाऊ नहीं
हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 (4) (बी) का उल्लेख करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट ने याची से कोई जवाब नहीं मांगा और उसका पक्ष जाने बिना ही एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दे दिया। न्यायालय ने कहा कि सरकारी कर्मचारी को दी गई वैधानिक सुरक्षा का पालन नहीं किया गया।
कोर्ट ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो कि डॉ. राहुल वर्मा शिकायतकर्ता की पत्नी के उपचार या शल्यक्रिया में शामिल थे अथवा उन्होंने किसी प्रकार की चिकित्सकीय लापरवाही की थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और मामले के तथ्यों को देखते हुए हाईकोर्ट ने 12 अगस्त 2026 का मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही डॉ. राहुल वर्मा के खिलाफ शुरू की गई संबंधित पूरी कार्यवाही भी निरस्त कर दी।