फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

डॉक्टरों पर लगाम! आसान नहीं यह काम

Thu, 06 Apr 2017 01:01 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो इलाहाबाद
विज्ञापन
इलाहाबाद
विज्ञापन
 मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस बात का ऐलान किया है कि सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेज के निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों पर कार्रवाई होगी। सरकार इसके लिए कानून भी बनाएगी, लेकिन यह काम इतना आसान नहीं दिखता। पूर्व में भी भी निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों को चिह्नित कर सूची बनाने और उनके खिलाफ कार्रवाई की कोशिश हो चुकी है, मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात ही निकला। हर बार मामला ठंडे बस्ते में चला गया। बेखौफ सरकारी डॉक्टर खुलेआम निजी प्रैक्टिस कर मोटी फीस के साथ जमकर धन उगाही कर रहे हैं।
विज्ञापन


शहर में कई डॉक्टर ऐसे हैं, जिनके नर्सिंग होम भी हैं। खुद का नाम गुप्त रहे इसलिए निजी अस्पतालों का स्वामित्व संबंधित डॉक्टरों की पत्नी, बच्चों या फिर किसी नजदीकी रिश्तेदार का होता है। कितनी भी सख्ती हो, सरकारी डॉक्टर कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते हैं। मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज और सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों का नाम और रौब बड़ा होता है। सरकारी अस्पताल में एक रुपये का पर्चा बनवाक र एक डॉक्टर की ओपीडी में सैकड़ों मरीज अपनी बारी का इंतजार करते हैं। वहीं प्राइवेट तौर पर एक मरीज देखने के लिए पांच सौ से आठ सौ तक की फीस ली जाती है। घंटों पहले नाम लिखाकर नंबर लेना पड़ता है, लेकिन आठ से 12 सौ रुपये देने पर स्पेशल केस डॉक्टर तुरंत देख लेते हैं। जानकारों के मुताबिक मेडिकल कॉलेज के 80 प्रतिशत डॉक्टर निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं, इनमें कई एचओडी भी शामिल हैं।

सरकार ने पिछले डेढ़ दशक में कई बार सरकारी चिकित्सकों पर निजी प्रैक्टिस करने पर रोक लगाई। डॉक्टर निजी प्रैक्टिस न करें, इसके लिए डॉक्टरों को एनपीए भत्ता दिया। फिर निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों को चिह्नित कर सूची बनाई गई। बावजूद इसके कार्रवाई केवल नाम करने के लिए हुई। दबाव बढ़ा तो सरकारी डॉक्टरों ने वीआरएस लेने की अप्लीकेशन लगा दी। अस्पतालों में वैसे ही डॉक्टरों की कमी है, ऐसे में दबाव बनाने की रणनीति में डॉक्टर सफल हो जाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें