विवेचना के बाद खालिद और नन्नू के खिलाफ आरोप पत्र लगा। ट्रायल के दौरान मुद्दई की मौत हो गई। खालिद ने आरोप को गलत बताते हुए कहा था कि यह मामला झूठा बनाया गया है। ट्रायल कोर्ट ने 2005 में उन्हें दोषी ठहराया था। सजा के खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अपील के दौरान नन्नू की मौत हो गई।
कोर्ट ने पाया कि घटना के समय गवाहों का वहां मौजूद होना और उनका व्यवहार काफी अजीब था। गोली लगने की कहानी भी अविश्वसनीय लगी। लिहाजा, कोर्ट ने माना कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि घटना वास्तव में वैसे ही हुई थी, जैसा बताया गया था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा-32 का लाभ तभी मिलेगा, जब मुद्दई की मौत उसी घटना या उससे लगी चोटों के कारण हुई हो। यदि उसकी मृत्यु किसी अन्य कारण से हुई है तो एफआईआर की सामग्री साक्ष्य नहीं बन सकती। ऐसी स्थिति में न तो एफआईआर का लेखक और न ही जांच अधिकारी उसके तथ्यों को साबित कर सकते हैं। वे केवल इतना बता सकते हैं कि रिपोर्ट किसने लिखवाई, किसने लिखी और किस दिन दर्ज हुई।
कोर्ट ने कहा कि एफआईआर घटना का सबसे प्रारंभिक विवरण होती है और उसकी सामग्री केवल वही व्यक्ति साबित कर सकता है जिसने उसे दर्ज कराया हो। उसके अभाव में एफआईआर का उपयोग न तो गवाहों की पुष्टि के लिए किया जा सकता है और न ही उसे स्वतंत्र साक्ष्य माना जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयान स्वाभाविक नहीं हैं। अभियोजन की कहानी साबित करने का तरीका भौतिक तथ्यों और चिकित्सकीय साक्ष्यों से मेल नहीं खाता। इसलिए अभियोजन आरोप संदेह से परे सिद्ध करने में असफल रहा।