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अधिग्रहण के बाद किसानों को मुकदमे में उलझाना गलत

Sat, 17 Dec 2016 01:53 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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अदालत - फोटो : file
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विकास के नाम पर किसानों की भूमि अधिग्रहीत कर उनको मुआवजा देने के बजाए वर्षों तक मुकदमे में उलझाए रखने पर हाईकोर्ट ने गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने इस प्रवृत्ति पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि सरकार ने जमीन अधिग्रहीत कर मेसर्स ओसवाल केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर को दे दिया। कंपनी ने मुआवजे के अवार्ड के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया और किसानों को 27 साल तक इसमें उलझाकर रखा। इसके बाद कंपनी ने बड़ी कीमत लेकर जमीन दूसरे को बेच दी।
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कोर्ट ने ओसवाल फर्टिलाइजर की 61 अपीलों को खारिज करते हुए प्रत्येक अपील के हिसाब से कंपनी पर दस हजार रुपये का हर्जाना लगाया है। यह भी आदेश दिया है कि किसानों का मुआवजा देय तिथि से ब्याज सहित तीन माह में दिया जाए। ओसवाल केमिकल एंड फर्टिलाइजर लिमिटेड शाहजहांपुर की प्रथम अपील पर न्यायमूर्ति एसपी केसरवानी ने सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि किसानों को प्रस्तावित मुआवजे में से आधे से कम राशि का अवार्ड हुआ। उसके खिलाफ भी कंपनी ने मुकदमा कर दिया और खाद का कारखाना भी नहीं चला सके। उसे बेच दिया गया।

प्रदेश सरकार ने शाहजहांपुर के पिपरोला अहमदपुर, किसुरही और मुकलपुर की 755.97 एकड़ भूमि का अधिग्रहण 22 अगस्त 1989 में किया था। जमीन ओसवाल कंपनी को खाद का कारखाना बनाने के लिए दे दी गई। विशेष भूमि आध्याप्ति अधिकारी ने 55 हजार रुपये प्रति बीघा मुआवजे का निर्धारण किया। कंपनी इसके खिलाफ सिविल कोर्ट चली गई। जिला जज ने सड़क के किनारे की 70 मीटर तक की जमीनों का 41, 55 प्रति बीघा तथा शेष भूमि का मुआवजा 25 हजार रुपये प्रति बीघा कर दिया। कंपनी ने इसे भी हाईकोर्ट में चुनौती दे दी। इस सारी प्रक्रिया में करीब 27 साल गुजर गए और किसान मुआवजे की आस में बैठे रहे। कंपनी का कहना था कि गांव सभा से 170.40 एकड़ जमीन 28729 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से मिली थी। इस लिहाज से किसानों की जमीन का मुआवजा काफी ज्यादा है।
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कोर्ट ने किसानों के साथ हुए अन्याय पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि विकास के नाम पर गरीब किसान से जमीन लेना उसके खेती करने के मूल अधिकार का हनन है। ऊपर से मुआवजे के लिए वर्षों मुकदमे में उलझाना अन्याय है। इस प्रकार के मुकदमों से सरकार पर भी वित्तीय बोझ पड़ता है। कोर्ट ने कहा कि खेती किसान की जीविका का आधार होती है। उसका जीवन अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने में बीतता है। कोर्ट का कहना था कि खेती  किसान की आर्थिक सुरक्षा, शांति, संपन्नता और सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार है। किसान को प्राकृतिक आपदाओं सूखा और बाढ़ तथा अनाज की कीमतों के उतार चढ़ाव से भी जूझना होता है।

बिचौलिए उनकी मेहनत और गाढ़ी कमाई का लाभ छीन लेते हैं, जिससे किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती है। अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि उत्पाद की कीमत उत्पादक तय करता है, मगर खेती के मामले में यह अपवाद है। यहां उत्पादक यानी किसान को अपनी फसल की कीमत तय करने का अधिकार नहीं है। देश की आर्थिक तरक्की का लाभ सभी वर्गों को नहीं मिल पा रहा है। यही कारण है कि किसान आज भी उसी हाल में हैं, जिसमें वे दशकों पहले थे। यही वजह है कि किसान अपने परिवार का पालन करने में असमर्थ है। उस तक आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं भी नहीं पहुंच पा रही हैं।
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