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साल भर वेतन देनेे के बाद छिन गया आसरा

Mon, 14 Sep 2015 12:17 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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इलाहाबाद (ब्यूरो)। प्रदेश सरकार की ओर से शिक्षामित्रों के समायोजन में प्रदेश सरकार की मनमानी आखिरकार प्रदेश के पौने दो लाख शिक्षामित्रों पर भारी पड़ गई। सरकार ने एनसीटीई की ओर से तय मानक की अनदेखी करके जिस प्रकार से शिक्षामित्रों को मनमाने तरीके से बिना किसी नियम के समायोजित किया, वह उसी पर भारी पड़ गया। टीईटी पास किए बिना और बारहवीं पास शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक बनाने में आरटीई-2009 के नियम सामने आए आ गए। सरकार की ओर से नियमों की गलत व्याख्या के कारण साल भर वेतन देने के बाद आखिर शिक्षामित्र से शिक्षक बने लोगों का आसरा छिन गया है।
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प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में कार्यरत 1.70 लाख शिक्षामित्रों को दो चरणों में दूरस्थ शिक्षा के जरिए बीटीसी का प्रशिक्षण देकर प्राथमिक विद्यालयों में समायोजित कर दिया गया। पहले चरण में दो अगस्त 2014 को 59 हजार शिक्षामित्रों को समायोजित किया गया। इन शिक्षकों में कुछ को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी को वेतन मिलना शुरू हो गया है। दूसरे चरण में 72 हजार शिक्षामित्रों को समायोजित किया गया। दूसरे चरण के शिक्षामित्रों को अभी तक वेतन जारी नहीं हो सका है। तीसरे चरण में 40 हजार शिक्षामित्रों का समायोजन किया जाना था। इन शिक्षामित्रों में बारहवीं पास भी थे। सरकार और शिक्षामित्रों की ओर से टीईटी नहीं पास करने की जिद तथा चयन की नियमावली का पालन न करना उनपर भारी पड़ गया।

शिक्षामित्रों के समायोजन की प्रक्रिया पूरी होने पर प्रदेश सरकार पर हर महीने 5.472 अरब रुपये का खर्च आता। निश्चय ही प्रदेश सरकार शिक्षामित्रों का समायोजन राजनीतिक लाभ के लिए कर रही थी। समायोजन के बाद प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक पद पर नियुक्त होने वाले शिक्षामित्रों को हर महीने 32 हजार रुपये मासिक के हिसाब से 1.71 लाख शिक्षकों का एक महीने का वेतन 5.472 अरब का खर्च आता।
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