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41 साल बाद मिला बुलाकी के परिवार वालों को न्याय

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After 41 years in Prayagraj, the people of Bulaki got justice
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प्रयागराज। पुलिस हिरासत में 16 साल के किशोर की मौत पर उसके परिजनों को न्याय मिलने में पूरे 41 साल लग गए। फैसला आने से पहले ही हत्या के आठ में से पांच आरोपी अपनी स्वाभाविक मौत मर चुके हैं। इनमें तत्कालीन थानाध्यक्ष धूमनगंज भी शामिल हैं। मृतक बुलाकी की मौत का मुकदमा भी पुलिस ने दर्ज नहीं किया था। अदालत ने स्वयं इस घटना का संज्ञान लेकर परिवाद कायम कर मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने अभियुक्त राम कुमार, लालचन्द और रामखेलावन को हत्या के आरोप में उम्रकैद और दस-दस हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। सजा का आदेश अपर सत्र न्यायाधीश आईडी दुबे ने एडीजीसी केएन सिंह और अखिलेश सिंह विसेन को सुनकर दिया है।
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फैसला आने से पूर्व इस हत्याकांड के अभियुक्तगण रामसरन उर्फ ननका, रामानन्द उर्फ नारद, रामसजीवन, दशरथ उर्फ चौबे और तत्कालीन एसओ धूमनगंज राम सागर यादव की दौरान मुकदमा मौत हो गई थी। इस मुकदमे में 1981 में ही तीन गवाहों को परीक्षित कराया गया था। इसके बाद 1981 से लेकर 2019 के बीच 38 साल बीत जाने के बाद भी अभियोजन ने एक भी गवाह पेश नहीं किया। 13 जून 2019 को कोर्ट ने गवाहों को पेश करने के लिए अंतिम अवसर देते हुए नोटिस जारी किया।
धूमनगंज पुलिस ने रिपोर्ट दी कि चाराें गवाहों की मौत हो चुकी है। हेडकांस्टेबल लक्ष्मी नारायण द्विवेदी ने कोर्ट में उपस्थित होकर मृतक गवाहों की रिपोर्ट को साबित किया। कोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट के बाद साक्ष्य का अवसर समाप्त कर दिया और मुकदमे की अग्रिम सुनवाई शुरू की। 19 जून को हत्याकांड के जीवित बचे अभियुक्तगण का बयान दर्ज किया गया।
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यह था मामला
घटना छह फरवरी 1978 की धूमनगंज थाने के कसारी मसारी मत्तन का पूरा की है। वादी हरीलाल ने राम कुमार आदि के खिलाफ जिला न्यायालय में परिवाद दाखिल किया था। वादी का कहना था कि अभियुक्तगण से उसकी पुरानी रंजिश थी। छह फरवरी 1978 को रात दस बजे उसका पुत्र बुलाकी लाल घर आ रहा था। अभियुक्तगण ने उसे अकेला पाकर लाठी डंडों से पीटा। घायल हालत में ही उसे एसओ धूमनगंज रामसागर के हवाले कर दिया गया। उन्होंने बुलाकी को पीटा फिर थाने उठा ले गए। चोटों की वजह से उसकी थाने में ही मौत हो गई। एसओ ने घर वालों को घायल बुलाकी से मिलने भी नहीं दिया। वादी भाग कर डीएम के आवास पर गया तो पता चला कि डीएम माघ मेला चले गए है। दूसरे दिन कचहरी गया तो पता चला कि उसके पुत्र की मौत हो गई है। आठ फरवरी को वह थाने गया तो उसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। पोस्टमार्टम के बाद उसके पुत्र का शव दे दिया गया था। वादी ने घटना के संबंध में डीएम, एसपी और केंद्रीय गृहमंत्री को तार और रजिस्ट्री से सूचना दी थी। कोर्ट में परिवाद दाखिल करने के बाद 11 फरवरी 1978 को उसका बयान सीजेएम ने दर्ज किया था। चार अगस्त 1979 को सीजेएम ने प्रकरण को सत्र न्यायालय में भेजा था। कोर्ट ने 1980 को अभियुक्तों के खिलाफ आरोप तय किया और 1981 में वादी हरी लाल, भुल्लन और मैकू लाल की गवाही हुई थी। इसके बाद से 38 साल तक मुकदमे में कोई सुनवाई नहीं हुई और अभियोजन गवाही नहीं करा सका। इसी दौरान कई अभियुक्तों और गवाहों की मौत हो गई।
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