इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म मामले में पीड़िता और अन्य गवाहों के बयानों में विरोधाभास हैं। मेडिकल रिपोर्ट में भी पीड़िता के शरीर पर किसी चोट का निशान नहीं मिला, जबकि बयान में घटना के दौरान मारपीट की बात कही थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म मामले में पीड़िता और अन्य गवाहों के बयानों में विरोधाभास हैं। मेडिकल रिपोर्ट में भी पीड़िता के शरीर पर किसी चोट का निशान नहीं मिला, जबकि बयान में घटना के दौरान मारपीट की बात कही थी। ऐसे में चोट का न मिलना मामले को संदिग्ध बनाता है।
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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने जालौन निवासी याची मेहंदी हसन को दुष्कर्म मामले में संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। याची ने ट्रायल कोर्ट से मिली सात साल की सश्रम कारावास की सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कुठौंद थाने में पीड़िता ने आठ अक्तूबर 1984 को दुष्कर्म के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। आरोप लगाया था कि मेहंदी हसन ने उसके साथ मारपीट करने के बाद दुष्कर्म किया।
कोर्ट ने पाया कि घटना के करीब 13 दिन बाद पीड़िता की मेडिकल जांच हुई, जिसमें उसके शरीर पर कोई चोट नहीं मिली। मेडिकल जांच करने वाली डॉक्टर को भी अदालत में गवाही के लिए पेश नहीं किया गया था। गवाहों के बयानों में भी असंगतियां थीं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया। कहा कि पीड़िता की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है, लेकिन गवाही की विश्वसनीयता की कड़ी जांच जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि बयान में महत्वपूर्ण खामियां-विरोधाभास हों और उनसे अभियोजन के मामले पर संदेह पैदा हो तो अदालत अन्य साक्ष्यों और परिस्थितियों से पुष्टि पर विचार कर सकती है।