प्रयागराज। इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) के मुकुट में एक और हीरा जड़ गया है। यहां शिक्षक रहे प्रो. अभिराज राजेंद्र प्रसाद मिश्र को साहित्य के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान मिला है। इससे पहले इविवि के कुलपति रहे प्रो. आद्या प्रसाद मिश्र को साहित्य के क्षेत्र में पद्मश्री पुरस्कार मिला था, जो प्रो. अभिराज के चाचा हैं। प्रो. आद्या भी इविवि के संस्कृत विभाग में शिक्षक थे। प्रो. अभिराज मानते हैं कि आज वह जो कुछ भी ही हैं, अपने चाचा की बदौलत हैं। उन्हीं के संरक्षण में पढ़ाई-लिखाई की और जीवन का एक लंबा सफर तय किया।
कवि, नाट्यकार, कथाकार एवं ओजस्वी वक्ता प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र का जन्म दो जववरी 1943 को जौनपुर के द्रोणीपुर गांव में हुआ था। उच्च शिक्षा के लिए वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय आए और बीए, एमए एवं डीफिल की उपाधि यहीं से प्राप्त की। 1964 में एमए संस्कृत परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए और प्रथम स्थान पाने के साथ आर्ट्स फैकल्टी के टॉपर रहे। इसके बाद 1966 से 1991 यानी 25 साल तक उन्होंने इविवि के संस्कृत विभाग में अध्यापन कार्य किया। वह यहां लेक्चरर एवं लीडर के पद पर कार्यरत रहे। इसी बीच भारत सरकार ने उन्हें बाली द्वीप (इंडोनेशिया) के उदयन विश्वविद्यालय में विजिटंग प्रोफेसर नियुक्त कर दिया, जहां उन्होंने मार्च 1987 से अप्रैल 1989 तक रहकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर का उत्कृष्ट साहित्यिक कार्य किया।
भारत लौटते ही 1991 में हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी, शिमला में प्रोफेसर एवं अध्यक्ष नियुक्त हो गए। अभी सेवा अवधि बीती भी नहीं थी कि उन्हें संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया गया। वह 2002 से 2005 तक कुलपति रहे। तीन सौ शोध निबंधों के सर्जक प्रो. मिश्र को साहित्य अकादमी, केके बिरला फाउंडेशन का वाचस्पति सम्मान, कालिदास सम्मान, कल्पवल्ली सम्मान, राष्ट्रपति सम्मान के अतिरिक्त दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध प्रदेश और उत्तर प्रदेश की अकादमियों के भी पच्चीस से अधिक साहित्यिक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।
प्रो. अभिराज ने लिखा इविवि का कुलगीत
प्रो. अभिराज ने ही इविवि के कुलगीत की रचना की। जो विश्वविद्यालय में आयोजित होने वाले सभी कार्यक्रमों में गाया जाता है। संगीत विभाग के हेड रहे प्रो. आरए झा ने इस गीत को राग दिया था।