इलाहाबाद। चर्चित आरुषि-हेमराज हत्याकांड में उम्रकैद की सजा भुगत रहे डा. राजेश और नुपूर तलवार की जेल से बाहर आने की कोशिश को करारा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने अपील लंबित रहने के दौरान उनको जमानत पर रिहा करने से इंकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को निलंबित करने की मांग भी नहीं मानी। जमानत प्रार्थनापत्र पर अपना निर्णय सुनाते हुए न्यायमूर्ति राके श तिवारी और न्यायमूर्ति अनिल कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि अभियुक्तों ने जिस तरीके से इस बर्बर दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया है उसे देखते हुए जमानत का आधार नहीं बनता है। खंडपीठ का मत था कि प्रथम दृष्टया ट्रायल कोर्ट के निर्णय में हमें ऐसी कोई कमी नजर नहीं आती है जिसका लाभ देकर अभियुक्तों को जमानत पर रिहा किया जाए। कोर्ट ने अपील पर त्वरित सुनवाई का आदेश देते हुए अगली तिथि 28 मई नियत की है।
जमानत के लिए दी गई दलीलें
तलवार दंपति केवकीलों कहना था कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का है। घटना का एक भी चश्मदीद गवाह नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण साक्ष्यों को नजअंदाज किया है। अभियुक्तगण ट्रायल के दौरान जमानत पर थे। यदि दोनों को अपील के निस्तारण तक जेल में ही रखा जाता है और बाद में निर्दोष सिद्ध होते हैं तो यह अपने आप काफी हास्यास्पद होगा क्योंकि हाईकोर्ट में अपील का निस्तारण 25-30 वर्षों के बाद हो सकेगा। मौजूदा समय में यहां वर्ष 1982-83 की अपीलें सुनी जा रही हैं। वकीलों ने यह भी आधार लिया कि ट्रायल कोर्ट ने कई तथ्यात्मक गलतियां की हैं जिसका लाभ अभियुक्तों को मिलना चाहिए। सीबीआई घटना की रात हेमराज की आरुषि के कमरे में मौजूदगी को भी साबित नहीं कर सकी है।
जमानत के विरोध में सीबीआई की दलील
सीबीआई और प्रदेश सरकार की ओर से जमानत के विरोध में कहा गया कि तलवार दंपति प्रभावशाली व्यक्ति हैं। मामले की जांच के दौरान भी इन्होंने तमाम तरीकों से जांच को प्रभावित करने का प्रयास किया। हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में याचिकाएं दाखिल कर ट्रायल को विलंबित करने का प्रयास किया गया। तलवार दंपति ने हत्याकांड के बाद जिस तरीके से आरुषि के शरीर और कमरे को साफ किया, हेमराज को छत पर घसीट कर ले गए और वहां सफाई की गई, बाहर से किसी आने का साक्ष्य नहीं मिलना जैसे साक्ष्यों से दोनों के हत्या करने और उसके बाद जांच को प्रभावित करने की कोशिश को साबित करती हैं। यदि इनको जमानत पर रिहा किया जाता है तो यह अपने प्रभाव का पुन: इस्तेमाल करेंगे और अपील पर अगले 25-30 वर्षों के बाद भी सुनवाई नहीं हो सकेगी।
कोर्ट की टिप्पणी
‘‘तलवार दंपति प्रभावशाली और रूतबेदार लोग हैं जो कि गवाहों, डाक्टरों और सीबीआई की जांच टीम को प्रभावित कर सकते हैं और यह कई बार न सिर्फ इस अदालत बल्कि सर्वोच्च न्यायालय भी जा चुके हैं। घटना केसमय यह लोग अपने फ्लैट में रह रहे थे मगर अब राज्य से और इस न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर रह रहे हैं। यदि इनको जमानत पर रिहा किया जाता है तो इनके अपील पर सुनवाई के दौरान अदालत में हाजिर होने की संभावना कम है। खुद इनके मुताबिक अपील पर सुनवाई 25-30 वर्षों के बाद होगी। इन हालात में अभियुक्तों को जमानत देने का मतलब उनके इरादों को सफल बनाना है। ’’ खंडपीठ