इलाहाबाद। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कैडर वोटरों के सहारे बहुजन समाज पार्टी यूपी की सत्ता पर बेशक कई बार काबिज हो चुकी हों, लेकिन लोकसभा चुनावों में जिले में पार्टी की स्थिति कुछ खास नहीं रही। कैडर वोटरों की राजनीति करने वाली बसपा के तमाम प्रत्याशियों को लोकसभा चुनावों में हार का ही सामना करना पड़ा। यहां तक कि खुद बसपा के संस्थापक कांशीराम फूलपुर सीट से दो बार लड़े और हार गए। पूरा जोर लगाने के बाद पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा फूलपुर संसदीय सीट पर जीत हासिल कर सकी। हालांकि 2007 के विधानसभा चुनाव के नतीजे यह साबित करने को काफी हैं कि जिले में बसपा का वोट कम नहीं है। उस चुनाव में आठ विधानसभा सीटों पर बसपा का कब्जा था। 2012 के विधानसभा चुनावों में सपा की लहर के बाद भी बसपा को तीन सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस बार के लोकसभा चुनाव में बसपा दोनों सीटों पर लड़ाई में दिख रही है। कैडर वोट के साथ कहीं ब्राह्मण, मुस्लिम साथ दिख रहे हैं तो कहीं पटेल और कुछ पिछड़ी जातियां। समीकरण ठीक दिख रहे हैं लेकिन वोटरों का मिजाज भांपना सरल नहीं।
बसपा ने जिले के सियासी मैदान में इंट्री 1988 से की। बोफोर्स कांड के चलते तत्कालीन सांसद फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन ने इस्तीफा दे दिया था और उपचुनाव हुए। उपचुनाव में तत्कालीन बसपा सुप्रीमो कांशीराम मैदान में उतरे लेकिन उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 1989 में हुए चुनाव में बसपा ने फूलपुर सीट से बेनी माधव बिंद और इलाहाबाद से जंग बहादुर पटेल को उतारा। दोनों को हार का सामना करना पड़ा। दोनों प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे। बिंद को 23.22 फीसदी और जंग बहादुर को महज 19 फीसदी मत मिले। 1991 में पार्टी ने एक बार इन्हीं दोनों प्रत्याशियों पर दांव लगाया। इस चुनाव में बेनी माधव बिंद तो दूसरे स्थान पर रहे जबकि जंग बहादुर पटेल 14.56 प्रतिशत मतों के साथ चौथे स्थान पर खिसक गए।
1996 में पार्टी सुप्रीमो कांशीराम एक बार फिर फूलपुर संसदीस सीट से किस्मत आजमाने उतरे। जबकि राम सेवक को इलाहाबाद सीट से मैदान में उतारा। इस चुनाव में कांशीराम को दोबारा शिकस्त खानी पड़ी। कभी उनके सिपलसालार रहे जंग बहादुर सिंह पटेल ने ही उन्हें हराया।
1998 के लोकसभा चुनाव हुए तो पूर्व प्रत्याशियों को दरकिनार करते हुए बसपा ने रामपूजन पटेल और डॉ. केपी श्रीवास्तव पर दांव खेला। लेकिन एक बार फिर पार्टी कैडर काम नहीं आया। दोनों प्रत्याशी तमाम पूर्व प्रत्याशियों की तरह तीसरे स्थान पर रहे। अगले चुनाव में पार्टी ने इलाहाबाद सीट से राम दुलार सिंह पटेल और फूलपुर सीट से तुलसीराम यादव को आजमाया। दोनों प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे। 2004 केलोकसभा चुनाव में पार्टी ने फूलपुर सीट से केशरी देवी को टिकट दिया लेकिन वह भी सपा के बाहुबली प्रत्याशी अतीक अहमद से चुनाव हार गई।
तमाम कोशिशों के बाद बसपा ने जिले में पहली बार 2009 में हुए 15वीं लोकसभा चुनाव में जीत का स्वाद चखा। दलित-ब्राह्मण समीकरण में फूलपुर संसदीय सीट से पार्टी प्रत्याशी कपिलमुनि करवरिया को जीत हासिल की। उन्होंने प्रतिद्वंद्वी सपा प्रत्याशी श्यामाचरण गुप्ता को 14578 मतों के अंतर से हराया। हालांकि इस समीकरण के बाद भी इलाहाबाद सीट पर पार्टी प्रत्याशी अशोक बाजपेयी चुनाव हार गए।