इलाहाबाद। किसी रोते-बिलखते के आंसू पोछने, बेसहारों को ठौर देने और फिर उसे पढ़ा-लिखाकर या हुनरमंद बनाकर स्वावलंबी बनाना कोई आसान काम नहीं है, लेेकिन जीटी रोड स्थित बेसहारा बेटियों के ठौर, ‘स्नेहाश्रय’ और कानूनी सलाहकार केंद्र ‘सहयोग’ की संचालिका सिस्टर शीबा जोस इसे पूरी शिद्दत से पूरा कर रही हैं। हाईकोर्ट की अधिवक्ता सिस्टर शीबा ने बीते सत्रह बरस के दौरान तकरीबन दो हजार से ज्यादा बेटियों के माथे से बेसहारा होने का दाग मिटा कर उन्हें आत्मनिर्भर, स्वावलंबी बनाया है। फिलहाल उनकी देखरेख में स्नेहाश्रय में पल-बढ़ रही 55 बेटियां शिक्षा और प्रशिक्षण के जरिये आत्मनिभर हो रही हैं।
शीबा की देखरेख में पढ़-लिखकर निकलीं बेटियां सूरत में फैशन डिजाइनिंग, सोनभद्र, अहमदाबाद में टीचर, इंदौर में कंप्यूटर विशेषज्ञ. अमेरिका में नर्सिंग होम सहित देश के दूसरे जिलों में अलग-अलग व्यवसाय से जुड़कर सफलतापूर्वक जीवन निर्वाह कर रही हैं। एक बेटी का सपना तो आईएएस बनना है, सो वह आईएएस की परीक्षा की तैयारी में जुटी है। अब तक यहां से निकलकर तकरीबन दो हजार से ज्यादा बेटियां तमाम अच्छे घरों में होम नर्सिंग, नर्सिंग होम आदि से जुड़कर अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी हैं।
आमतौर पर अठारह बरस की जिस उम्र में जब कोई बेटी जीवन को लेकर जाने कितने सुनहरे सपने बुनती हैं, सिस्टर शीबा ने बेसहारा बेटियों की सूनी जिंदगी में रंग भरने और उसकी रफ्तार को सही दिशा देने का संकल्प ले लिया था। केरल के कन्नूर में जन्मीं, पली-बढ़ी और पढ़ीं शीबा ने सेवा संकल्प के तहत अर्सलाइन ऑफ मेरी इंमैक्यूरेट के कांग्रीगेशन में लखनऊ प्रॉबिंस से जुड़कर सेवा के साथ कानपुर से बीए, एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। कुछ दिनों तक हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में प्रैक्टिस के बाद वह इलाहाबाद धर्मप्रांत के बिशप ईसीडोर फर्नाडिस के निमंत्रण पर इलाहाबाद आ गईं।
बेटियों की मदद को ही वर्ष 1996 में पहले सहयोग सेल और फिर स्नेहाश्रय की संचालिका बन गईं। अनेक संस्थाओं के सहयोग से यहां पहुंची, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न की शिकार या घर से भागी बेटियों को यहां ठौर मिला। शीबा की परवरिश में उन्हें पढ़ने, लिखने, कंप्यूटर, नर्सिंग, केयरटेकर आदि का प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाया गया। समर कैंप के दौरान भी उन्हें कई तरह के व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए जाते हैं। सिस्टर शीबा कहती हैं, पीड़ित, परेशान स्नेहाश्रय में आने और यहां से स्वावलंबी बनकर जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। कई बेटियों की, उनके मनपसंद लड़कों के साथ शादी भी कराई गई। मेरी कोशिश है कि बेटियां ज्यादा से ज्यादा पढ़लिखकर आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बन सकें। बेटियां पढ़ी लिखीं और आर्थिक रूप से समृद्ध होंगी तो समस्याएं खुदबखुद उनके पास नहीं फटकेंगी।