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शोल्डर- नोबेल पुरस्कार पाने वाले दो वैज्ञानिकों का पूरा जीवन ही करता है इंस्पायर

Wed, 11 Dec 2013 05:41 AM IST
Allahabad
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इलाहाबाद। ऐसा आपने किस्से-कहानियों में पढ़ा सुना या फिल्मों में देखा होगा कि कैसे विपत्तियों का मारा एक बच्चा सफलता के शीर्ष तक पहुंचता है। लेकिन इसे हकीकत में बदला है भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान में पहुंचे दो नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों ने। नोबेल से अलग भी उनकी पहचान है और वह है उनके पूरे जीवन का संघर्ष। इन्होंने खुद को संभाला और हर संकट का डटकर मुकाबला किया। नाजियों के हमले में एक ने बचपन में ही माता-पिता को खो दिया और शरणार्थी कैंप में दिन गुजारे तो दूसरे को दर-दर भटकना पड़ा। इस मुश्किल भरी जिंदगी के बाद भी दोनों ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया बल्कि उस पीड़ा और औजार बनाया। ताकि नई दुनिया के निर्माण में उनकी अहम भागीदारी हो और उनकी तरह किसी और का बचपन नफरत के साये में दम न तोड़ दे। यह जीवन संघर्ष है 1996 में रसायन विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल पाने वाले ब्रिटेन में जन्मे प्रोफेसर सर होराल्ड डब्ल्यू. क्रोटो और रसायन विज्ञान के क्षेत्र में ही 1998 में नोबेल विजेता अमेरिका के प्रोफेसर वाल्टर जे. कोहेन का।
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आस्ट्रिया में जन्मे प्रोफेसर कोहेन के पिता सैलोमन तथा मां गिटेल की नाजियों ने हत्या कर दी थी। उन्हें जहरीले गैस से भरे कमरे में छोड़ दिया गया था। प्रोफेसर कोहने और उनकी बहन किसी तरह से वहां से भागने में सफल हुए । इंग्लैंड में उन्होंने एक फर्म में काम किया जहां उन्हें मेनेंजाइटिस जैसी गंभीर बीमारी ने भी जकड़ा लेकिन उन्होंने इस बीमारी को भी मात दी। इधर-उधर भटकते हुए वे कनाडा पहुंचे जहां एक परिवार ने शरण दी। वहां उन्होंने फौज में नौकरी की और आस्ट्रिया के खिलाफ लड़ाई भी लड़ी। इस दौरान उन्होंने हथियार और कलम साथ-साथ थामी और युद्ध के दौरान ही डिग्री प्राप्त की। इसके बाद समय गुजरने के साथ उपलब्धियां भी जुड़ती गईं और 1998 में नोबेल पुरस्कार विजेता बने। प्रोफेसर क्रोटो को भी नाजियों की कम यातना नहीं झेलनी पड़ी। प्रोफेसर क्रोटे का जन्म सात अक्तूबर 1939 में युद्ध के दौरान हुआ था। इसलिए इन्हें ‘वार बेबी’ भी कहा जाता है। नाजियों के डर से उनका पूरा बचपन इधर-उधर भटकते बीता लेकिन लगन और उत्साह के दम पर उन्होंने नोबेल पुरस्कार तक का सफर तय किया। ट्रिपलआईटी में युवा वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए दोनों वैज्ञानिकों ने खुद की कहानी से मेधावियों को प्रेरित किया और विपत्तियों से भागने के बजाय उनका सामना करने की नसीहत दी।
ट्रिपलआईटी में पूरे विश्व से जुटे दो हजार से अधिक युवा और बाल वैज्ञानिकों को मंगलवार को अद्भुत नजारा देखने को मिला। नोबेल पुरस्कार पाने वाले गुरु और शिष्य एक साथ नजर आए। क्वांटम सिस्टम के क्षेत्र में रिसर्च के लिए पिछले साल ही नोबेल पुरस्कार पाने वाले प्रोफेसर सर्जे होरेशे प्रोफेसर क्लाउडे कोहेन तनौजी के शिष्य हैं। सर्जे ने नोबेल पुरस्कार विजेता तनौजी के निर्देश में डॉक्टरेट की है। दोनों वैज्ञानिक परिसर में हर समय साथ-साथ तथा एक-दूसरे से गुफ्तगू करते नजर आए। प्रोफेसर तनौजी का कहना है कि होरेशे को देखते ही जान लिया था कि इसमें टैलेंट हैं। वह बहुत ही जोशीला और उत्साहित व्यक्तित्व वाला है। हालांकि उस समय यह नहीं सोचा था कि एक दिन वह नोबेल पुरस्कार के हकदार बन जाएंगे। प्रोफेसर होरेशे का कहना है कि सर के साथ कार्यक्रम साझा करना सम्मान की बात है। उनका स्नेह हमेशा ही मिलता रहा है।
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ट्रिपलआईटी में मंगलवार को सात नोबेल वैज्ञानिक एक साथ एक मंच पर नजर आए। मौका था सीसी-3 हाल के उद्घाटन का। विज्ञान समागम में इस बार सात नोबेल पुरस्कार विजेताओं को आमंत्रित किया गया था और मंगलवार को सभी मौजूद रहे। छह साल से आयोजित हो रहे इस समारोह में यह पहला मौका है जब सात नोबेल वैज्ञानिक इसमें शामिल हुए।
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