इलाहाबाद। पदोन्नति के लिए घूस देने के आरोप में फंसे रेलवे के अफसर महेश कुमार के पिछले कार्य भी जांच के दायरे में आ गए हैं। एनसीआर से जुड़े आईआरपीएमयू में तैनाती के दौरान उन्होंने ऑटोमेटिक सिगनलिंग के लिए उन्होंने करोड़ों रुपये के ठेके कराए थे। जर्मनी की कंपनी को कार्य आवंटन के ठीक बाद टेंडर को लेकर विवाद रहा। उस दौरान भी जांच की बात उठी लेकिन उनके ‘कौशल’ के आगे सब ठीक हो गया। अब, शिकंजे में आने के बाद सीबीआई उनके पुराने कार्यों को भी खंगाल रही है। दावा है कि आईआरपीएमयू के कार्यों की फाइलें भी जांच की जद में आ गई हैं।
रेलवे की सिगनल प्रणाली में सुधार का सबसे बड़ा काम महेश कुमार की आईआरपीएमयू के सीईओ रहने के दौरान ही शुरू हुआ। उनके कार्यकाल में ही दिल्ली-हावड़ा रूट के कानपुर-गाजियाबाद सेक्शन में ऑटोमेटिक सिगनलिंग के कार्य शुरू हुए। कानपुर से अलीगढ़ के बीच उनके कार्यकाल में ही कार्य पूरे हुए। इसके साथ ही कानपुर-इलाहाबाद और इलाहाबाद-मुगलसराय सेक्शन में ऑटोमेटिक सिगनल प्रणाली के टेंडर किए गए। ऑटोमेटिक सिगनल प्रणाली को लगाने का काम जर्मनी की फर्म को मिलने के साथ ही गड़बड़ी के आरोप लगने शुरू हो गए थे।
सूत्र बताते हैं कि एनसीआर के तत्कालीन महाप्रबंधक ने इन कार्यों की जांच कराने का प्रयास किया था लेकिन दिल्ली में बैठने वाले महेश कुमार की ‘कुशलता’ के आगे जांच नहीं हो सकी। रियल टाइम ट्रेन इन्फार्मेशन सिस्टम को लागू करने में विलंब को लेकर भी सवाल उठे। कानपुर-अलीगढ़ के बीच कार्य पूरा होने के बाद भी रेलवे के तकनीकी कर्मचारियों को ऑटोमेटिक सिगनल और उससे जुड़े उपकरणों के तकनीकी पहलुओं की जानकारी नहीं हो सकी। कर्मचारियों को इसके प्रशिक्षण भी नहीं दिए गए। रेलवे के आधिकारिक सूत्रों का दावा है कि एनसीआर की दिल्ली स्थित इस यूनिट के दस्तावेजों को भी सीबीआई ने खंगाला है। इसमें ऑटोमेटिक सिगनल प्रणाली के कार्य और ठेकों से जुड़ी फाइलें भी हैं। दूसरी ओर सीपीआरओ संदीप माथुर ने ऐसी किसी जानकारी से इनकार किया है।