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बोया गया जौ, रोपा तुलसी का बिरवा

Mon, 28 Jan 2013 05:30 AM IST
Allahabad
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महाकुंभ नगर। पौष पूर्णिमा के साथ ही रविवार से माह भर के संयम और साधना के अभ्यास, कल्पवास की भी शुरुआत हुई। परंपरा के तहत कल्पवासियों ने गंगा में डुबकी लगाने के साथ रेती पर माह भर रुकने का संकल्प लिया। शिविर के बाहर जौ बोया और तुलसी का बिरवा रोपा गया। कल्पवासी पूरे माह दो या तीन समय स्नान के साथ एक ही समय भोजन करेंगे और भूमि पर ही सोएंगे।
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संकल्प के तहत देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालु माघ पूर्णिमा तक रेती पर रहकर यम, नियम, व्रत का पालन करेंगे। तापस जीवन के पर्याय कल्पवास के तहत दिनचर्या में भगवत चर्चा, जप, तप और संयमित, अनुशासित व्यवहार शामिल रहेगा। वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित पद्मनारायण शोकहा के मुताबिक तुलसी का बिरवा रोपने और जौ बोने का उद्देश्य इसके विकास के साथ ही कल्पवासियों के आंगन में भी सुख और समृद्धि की कामना है।
इससे पहले संक्रांति से संक्राति की परंपरा के तहत मैथिल ब्राह्मणों ने मकर संक्रांति से ही कल्पवास की शुरुआत की थी। अबकी मकर संक्रांति पहले पड़ने के कारण पौष पूर्णिमा से शुरुआत करने वालों को पांच के बजाय सिर्फ चार, पौष पूर्णिमा, मौनी अमावस्या, वसंत पंचमी और माघ पूर्णिमा के स्नानपर्व मिलेंगे। बड़ी संख्या में कल्पवासियों के पहुंचने से संगम की रेती भरी पूरी हुई। मुख्य रूप से तीर्थ पुरोहितों के यजमान, कल्पवासियों के बहाने शिविरों में पूरा देश सिमट आया है।
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