यूजीसी की लिस्ट से इलाहाबाद के 19 जर्नल बाहर
0 शिकायतों के आधार पर यूजीसी ने कराई जांच, फिर हुई कर्रवाई
0 मान्य सूची से देश भर के शिक्षण संस्थान के 4305 जर्नल हटाए
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
खराब गुणवत्ता, गलत तथ्य, अपर्याप्त सूचनाओं और गलत दावों के कारण विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की ओर से मान्य सूची से चार हजार से अधिक जर्नल हटा दिए गए हैं। इसमें इलाहाबाद से जुड़े भी 19 जर्नल शामिल हैं। यूजीसी को शिकायत मिली थी कि कई जगह की फैकल्टी से गलत जर्नल प्रकाशित कराए गए और इन्हें यूजीसी की मान्य सूची में शामिल कर लिया गया। यूजीसी ने प्रकाशित किए गए जर्नल्स की स्टैंडिंग कमेटी से जांच कराई और शिकायत सही पाए जाने पर सूची से 4305 जर्नल बाहर कर दिए गए।
यूजीसी की मान्य सूची ने जिन जर्नल्स को बाहर किया गया है, उनमें इलाहाबाद से जुड़े इनवॉयर्नमेंटल एंड फॉरेस्ट लॉ टाइम्स, इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) से जुड़े इंटर जर्नल ऑफ स्ट्रेटजिक स्टडीज, शरीरिक शिक्षा उन्नयन संस्थान से जुड़े शोध संगम एन इंटरनेशनल जॅर्नल ऑफ फिजिकल एजूकेशन स्पोर्ट्स एंड एलाइड साइंसेज, इविवि से जुड़े जर्नल ऑफ पीस सिक्योरिटी एंड डेवलपमेंट, अरुंधति वशिष्ठ अनुसंधान पीठ के द जर्नल ऑफ इंडियन थॉट एंड पॉलिसी रिसर्च, इलाहाबाद जियोग्राफिकल के नेशनल जियोग्राफर, इविवि के जर्नल ऑफ मीडिया स्टडीज, दर्शन परिषद इलाहाबाद के संदर्शन, श्री भुवनेश्वरी विद्या प्रतिष्ठान इलाहाबाद के समाज धर्म एवं दर्शन, ओआईएचडी इलाहाबाद के द इक्वानिमिस्ट, भारतीय आर्थिक शोध संस्थान के वार्ता, इलाहाबाद के जर्नल ऑफ सोशल एंड पोलिटिकल स्टडीज शामिल हैं।
इसके अलावा इलाहाबाद के द जर्नल ऑफ कंटम्प्रेरी, डीएएमवीएएसएस समिति इलाहाबाद के संस्कृति संचय, सामाजिक विज्ञान अध्ययन एवं शोध संस्थान इलाहाबाद के संबोध, इंडियन प्रेस इलाहाबाद के प्रयाग पथ, केएन गुप्ता एजूकेशन सोसाइटी इलाहाबाद के द जर्नल ऑफ बिजनेस एंड इकोनॉमिक, भारतीय हिंदी परिषद इलाहाबाद के हिंदी अनुशीलन और इविवि के जर्नल ऑफ इंडियन जियोमॉर्फोलॉजी को भी यूजीसी की ओर से मान्य सूची से बाहर किया गया है।
यूजीसी के फैसले पर शोधार्थियों ने उठाए सवाल
यूजीसी के इस फैसले पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने सवाल उठाए हैं। इविवि में अर्थशास्त्र के शोध छात्र दिनेश यादव का आरोप है कि यूजीसी की नीति स्पष्ट न होने का खामियाजा छात्रों को उठाना पड़ रहा है। जब मन चाहा सूची से जर्नल को बाहर कर दिया और जब मर्जी हुई उसे शामिल कर लिया। जर्नल हटाए जाने से पहले उन्हीं के आधार पर हजारों अभ्यर्थियों ने अपने शोध पत्र प्रकाशित कराकर नौकरी पा ली या थीसिस जमा करके डॉक्टर की उपाधि प्राप्त कर ली। यूजीसी अब ऐसे लोगों का क्या करेगा? क्या उनकी नौकरी या उपाधि वापस ली जाएगी। छात्रों का आरोप है कि यूजीसी संसाधनों को बेहतर बनाने के बजाय केवल चर्चा में बने रहने के लिए अपनी अस्पष्ट नीतियों से छात्रों का शोषण कर रहा है।