क्या पानी पर टैक्स ले सकती है सरकार: हाईकोर्ट
अदालत में उठा अहम मुद्दा, वाटर एंड सीवेज एक्ट की धारा 52 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग
हाईकोर्ट ने महाधिवक्ता को इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष बताने को कहा
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
पानी पर टैक्स लगाने के प्रदेश सरकार के अधिकार पर सवाल उठ रहा है। हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से पूछा है कि क्या उसे पानी पर टैक्स लेने का अधिकार है। कोर्ट ने पूछा है कि जब पानी जीवन के लिए अनिवार्य है और इसे मौलिक अधिकार में शामिल किया गया है तो क्या इस संबंध वाटर एवं सीवेज एक्ट की धारा 52 असंवैधानिक है।
पतंजलि नर्सरी एवं ऋषिकुल स्कूल की याचिका पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति यूसी त्रिपाठी की पीठ का कहना है कि वाटर टैक्स लगाने का अधिकार संविधान की राज्य अनुसूची या समवर्ती अनुसूची में शामिल नहीं है तो फिर राज्य सरकार इस पर कैसे कानून बना सकती है। पीठ ने इस प्रकरण को सुनवाई के लिए मुख्य न्यायमूर्ति के समक्ष संदर्भित कर दिया है। अगली सुनवाई मुख्य न्यायमूर्ति की अदालत में होगी। संदर्भ में राज्य सरकार के जल कर लेने के अधिकार और वाटर एंड सीवेज एक्ट की धारा 52 की संवैधानिकता पर सवाल उठाया गया है।
याची स्कूल को नगर निगम के जलकल विभाग ने चार लाख 86 हजार 306 रुपये के वाटर टैक्स का नोटिस भेजा है। इसकी वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याची का कहना है कि जल कर लेने का मामला राज्य और समवर्ती अनुसूची में शामिल नहीं है, इसलिए राज्य सरकार इस पर न तो कानून बना सकती है और न कर वसूल सकती है। कोर्ट ने कहा कि यह जनहित से जुड़ा मामला है जिसमें राज्य सरकार की कानून बनाने की अधिकारिता पर सवाल उठाया गया है। जल निगम से इस संबंध में जानकारी मांगी गई थी मगर वह कोई जानकारी उपलब्ध नहीं करा सका। प्रदेश सरकार से भी कोर्ट ने जवाब मांगा है। चार जुलाई 2017 को कोर्ट को बताया गया कि इस मुद्दे पर महाधिवक्ता सरकार का पक्ष रखेंगे। चूंकि मामला ऐक्ट की वैधानिकता से जुड़ा है जिस पर सुनवाई का मुख्य न्यायाधीश को अधिकार है इसलिए पीठ ने प्रकरण मुख्य न्यायाधीश को संदर्भित कर दिया है।