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सीबीआई के निशाने पर होंगे अनिल, रिजवान

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आयोग के पांच फैसलों पर होगी सीबीआई की नजर
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0 यूपीपीएससी के हर निर्णय से जुड़ा है कोई न कोई बड़ा विवाद
0 परीक्षा परिणाम में कभी जाति-वर्ग तो कभी छिपाया गया नाम
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पांच फैसलों ने उसे कटघरे में खड़ा कर दिया है। सभी फैसले आयोग के पूर्व अध्यक्ष अनिल यादव और पूर्व संयुक्त सचिव रिजवानुर्रहमान के कार्यकाल में हुए थे। आंसर की जारी किए जाने का प्रस्ताव छिपाकर रखा गया, परिणाम में जाति/वर्ग का उल्लेख नहीं किया, नाम छिपाया गया, त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था लागू की गई और ओटीपी व्यवस्था भी लागू हुई। इन सभी फैसलों के साथ विवाद जुड़ा हुआ है। ऐसे में जांच के दौरान सीबीआई की नजर इन फैसलों पर होगी और निशाने पर पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व संयुक्त सचिव होंगे।
प्रतियोगियों का आरोप है कि सपा के कार्यकाल में आयोग ने इन पांच फैसलों की आड़ में जो भी गड़बड़ियां कीं, वह किसी एक विशेष जाति को फायदा पहुंचाने की लिए की गईं। त्रिस्तरीय आरक्षण व्यवस्था उसी जाति विशेष को ध्यान में रखकर लागू की गई थी लेकिन प्रदेश भर में जबर्दस्त विरोध के बाद इस निर्णय को वापस ले लिया गया। यह व्यवस्था पूर्व अध्यक्ष अनिल यादव के समय लागू की गई थी। उन्हीं के कार्यकाल में एक प्रस्ताव यह भी आया कि परीक्षा परिणामें में किसी जाति या वर्ग का उल्लेख नहीं किया जाएगा, ताकि जाति विशेष के अभ्यर्थियों के चयन पर कोई उंगली न उठा सके। यह प्रस्ताव 24 अगस्त 2014 को आया लेकिन जब प्रतियोगियों ने इस गड़बड़ी को भी पकड़ने का रास्ता निकाल लिया तो 22 अप्रैल 2015 में प्रस्ताव आया कि परिणाम केवल अनुक्रमांक और रजिस्ट्रेशन नंबर के आधार पर जारी होगा। नाम नहीं जारी किया जाएगा। इस प्रस्ताव को लागू करके आयोग अपनी गड़बड़ियों पर पर्दा डालने के मामले में एक कदम और आगे बढ़ गया।
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पूर्व संयुक्त सचिव रिजवानुर्रहमान के माध्यम से वन टाइप पासवर्ड (ओटीपी) का करने का प्रस्ताव आया, जो अब तक लागू है। ओटीपी के माध्यम से अभ्यर्थी सिर्फ अपनी कॉपी देख सकता है लेकिन दूसरे की कॉपी नहीं देख सकता। प्रतियोगियों ने सवाल उठाए कि आयोग अगर पारदर्शिता का दावा करता है तो दूसरों की कॉपियां सार्वजनिक करने में क्या दिक्कत है। इसके अलावा आयोग आंसर की जारी करने का प्रस्ताव भी लेकर आया था लेकिन लागू होने के बावजूद इसे छिपाकर रखा गया। प्रतियोगियों को इसके बारे में पता चला तो वे न्यायालय गए और न्यायालय के आदेश के बाद आयोग ने आंसर की जारी की। प्रतियोगियों ने ही कई उत्तरों पर सवाल उठाए और बाद में आयोग को उन्हें संशोधित करना पड़ा। ऐसे में सपा सरकार के कार्यकाल में आयोग पांचों फैसलों को लेकर घिरा रहा।
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