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वाराणसी का कछुआ अभ्यारण्य स् थानांतरित करने को चुनौती

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वाराणसी का कछुआ अभ्यारण्य
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स्थानांतरित करने को चुनौती
0 हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद निर्णय किया सुरक्षित
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। वाराणसी में गंगा के तट से कछुआ अभ्यारण्य हटाकर प्रयागराज के नेवादा से मिर्जापुर के अदलपुर के बीच किए जाने को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। कोर्ट ने इस पर सुनवाई के बाद अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया है। इस पर अदालत 17 दिसंबर को फैसला सुनाएगी। भरत झुनझुनवाला की जनहित याचिका पर मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति वाईके श्रीवास्तव ने सुनवाई की।
गंगा प्रदूषण याचिका के न्यायमित्र और अधिवक्ता अरुण गुप्ता ने याचिका पर पक्ष रखा। याचिका में कहा गया कि केंद्र सरकार ने 1996 में वाराणसी में रामनगर से मालवीय पुल के बीच के सात किलोमीटर के क्षेत्र को कछुओं के लिए सेंच्युरी (अभ्यारण्य) स्थापित किया है। यहां कछुओं के संरक्षण का कार्य होता है। अब केंद्र सरकार जल परिवहन योजना के कारण इसको प्रयागराज के नेवादा और मिर्जापुर के अदलपुर के बीच के गंगा के क्षेत्र में शिफ्ट करना चाह रही है।
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रामनगर में जहाजों के ठहराव के लिए फाउंडेशन बनाया जा रहा है। वाराणसी में कछुआ सेंच्युरी स्थापित करने की वजह यह थी कि पौराणिक मान्यताओं के कारण सबसे अधिक शवदाह बनारस में ही किए जाते हैं। शवों के अवशिष्ट गंगा में बहा दिए जाते हैं। कछुए इसे खाकर गंगा को प्रदूषित होने से बचाते हैं। अब स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर कछुओं को मानवीय हलचल से बचाने के लिए अन्यत्र बसाने की संस्तुति की गई है। यदि ऐसा किया गया तो गंगा में प्रदूषण का स्तर बढ़ जाएगा। केंद्र सरकार के अधिवक्ता का कहना था कि जल परिवहन की योजना सुप्रीमकोर्ट के निर्देश पर प्रारंभ की गई है। जबकि याची का कहना है कि जल परिवहन के लिए बनाए जा रहे टर्मिनल को मालवीय पुल के आगे बनाया जा सकता है। हालांकि, कोर्ट इस बात से सहमत नहीं थी कि जल परिवहन योजना के कारण सेंच्युरी हटाई गई है। कोर्ट ने कहा कि मानवीय हलचल से कछुओं को दूर रखना उनके हित में हैं। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया है।
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