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1971 की भारत-पाक जंग : रोशनी न जाए इसलिए खिड़कियों के शीशे पर लगा दिए थे कार्बन पेपर

Sat, 10 May 2025 01:36 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

भारत-पाकिस्तान के बीच जब 1971 की जंग हुई तो उस वक्त में 12वीं का छात्र था। हम एक हॉस्टल में रहते थे। तारीख तो याद नहीं, लेकिन सर्दी का मौसम था। हमारे कुछ साथी आए और कहने लगे कि भारत-पाकिस्तान में जंग छिड़ गई है।
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डॉ. एसबी सिंह और ध्रुव मालवीय। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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भारत-पाकिस्तान के बीच जब 1971 की जंग हुई तो उस वक्त में 12वीं का छात्र था। हम एक हॉस्टल में रहते थे। तारीख तो याद नहीं, लेकिन सर्दी का मौसम था। हमारे कुछ साथी आए और कहने लगे कि भारत-पाकिस्तान में जंग छिड़ गई है।

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इस बीच शिक्षक आए और कहा कि कुछ ही देर में ब्लैक आउट होने वाला है, इसलिए सभी लाइट बंद करके खिड़की बंद कर दो। अगर लाइट जलानी भी है तो खिड़की के शीशे पर कार्बन लगा दो। यह सुनते ही हम सभी छात्रों ने इस्तेमाल किए कार्बन पेपर खिड़की के शीशे पर चिपका दिए। यह कहना है सिविल लाइंस निवासी वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डाॅ. एसबी सिंह का।

तकरीबन 54 वर्ष पुराने इस वाकये को याद करते हुए डाॅ. एसबी सिंह बताते हैं, तब जंग से जुड़ी सभी जानकारी हमें रेडियो के माध्यम से ही मिलती थी। रेडियो में न्यूज आने का भी एक निश्चित समय होता था। रात में स्ट्रीट लाइट को भी टिन के पीस से कवर्ड किया जाता था, ताकि आसमान से स्ट्रीट लाइट न दिखे।
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दस दिन से ज्यादा तक तनावपूर्ण माहौल रहा, हालांकि उस दौरान सायरन का प्रयोग कम ही होता था। रात में हम लोग कहीं नहीं निकलते थे। शाम छह बजते-बजते बाजार में सन्नाटा पसर जाता था। हम सभी को सुबह के अखबार का इंतजार रहता था।

जिस दिन हम लोगों ने सुबह पढ़ा कि पाक के 90 हजार से ज्यादा सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया है, उस दिन हम सभी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। डाॅ. एसबी सिंह ने बताया कि उस दौरान हम सभी छात्र स्टेशन से गुजरने वाली ट्रेनों में बैठे फौजी भाइयों को बाल्टी से पानी एवं ब्रेड, फल आदि भी उपलब्ध करवाते थे।

सिविल डिफेंस में आठ हजार लोगों को कराया जाता था नियमित अभ्यास

सेवानिवृत्त रेलवे अफसर ध्रुव मालवीय बताते हैं, वर्ष 1971 की जंग के दौरान मेरी उम्र तकरीबन 31 वर्ष थी। जिस तरह से आज पूरा देश पीएम मोदी के साथ खड़ा है, तकरीबन वैसी ही स्थिति 1971 के दौरान भी थी। तब पूरा देश तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी के साथ पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए एकजुट था। उस हालात में जब कंट्रोल रूम से सायरन बजता था, तो सिविल डिफेंस में होने की वजह से लोगों को सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कहता था।

भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 में हुई जंग को याद करते हुए एमजी मार्ग निवासी ध्रुव मालवीय कहते हैं, लोगों से अपील की जाती थी कि घरों की खिड़कियां बंद कर दें। यह भी संदेश दिया जाता था कि घर के अंदर की रोशनी बाहर दिखाई न दें, इसलिए खुली जगह को काले कपड़ों से ढक दीजिए। रेलवे में सेक्शन इंजीनियर होने के साथ ही सिविल डिफेंस से भी जुड़ा हुआ था। तब तकरीबन आठ हजार लोगों को किसी भी हमले से बचाव एवं कैसे लोगों की सहायता की जाए, उसकी कई दिन प्रैक्टिस करवाई गई थी।

उस दौर में रेडियो से युद्ध के हालात को सुनने के लिए मोहल्ले के लोग समूह में एकत्र होते थे। तकरीबन 15 दिन तक ब्लैक आउट की स्थिति रही। उस दौरान सायरन हाथ से बजाने वाला होता था। प्रशासन सभी को विशेष हिदायत देता था कि ब्लैक आउट होने के बाद लाइट बिल्कुल भी न जलाई जाए, लेकिन कभी कभार कुछ लोग जरूरी काम करने के लिए चुपचाप लॉलटेन जला देते थे।
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शाम होते ही निकल जाते थे घरों की बत्तियां बुझवाने

पाकिस्तान के साथ 1971 में हुए युद्ध के दौरान सिविल डिफेंस में बतौर सेक्टर वार्डन शामिल कटरा के भारत भूषण कहते हैं, उन दिनों सूचना तंत्र उतना मजबूत नहीं था। ऐसे में वार्डन सेवा के लोगों का महत्व बढ़ जाता था। सायरन बजते ही हम भाग पड़ते थे और गली-गली जाकर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील करते। हमारे साथ दो और लोग थे।

उस समय करीब एक सप्ताह तक रोजाना ब्लैक आउट रहा। ऐसे में हम शाम होते ही सीटी बजाते हुए गली-गली भागने लगते। लोगों से बिजली, टार्च आदि बुझाने की अपील करते थे। हम युवा थे। ऐसे में कई बार लोग बिजली नहीं बुझाते तो उग्र भी हो जाते लेकिन सीनियर हमें समझाते।

साथ ही लोगों से खतरे का एहसास कराते हुए लाइट बुझाने की अपील करते। 1971 के युद्ध में बड़ी संख्या में पाकिस्तान के बंदी सैनिकों को मजार चौराहे के पास बने बैरक में रखा गया था। हम उधर से गुजरते तो उन्हें हाय-हैलो करते। कटाक्ष भी करते, वे भी जवाब देते, हालांकि वहां रुकने की अनुमति नहीं थी। वे सामान्य तरीके से रह रहे थे। उनमें किसी तरह का तनाव नहीं था। जैसे उन्हें भरोसा था कि भारत में उनके साथ कुछ गलत नहीं होगा। उन्हें सुरक्षित पाकिस्तान को सौंप दिया जाएगा।
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