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विकाय प्राधिकरणों को खत्म कर बढ़ाइ्र जाएं निकायों की शक्तियां

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विकास प्राधिकरणों को खत्म कर बढ़ाई जाएं निकायों की शक्तियां
0 जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने महाधिवक्ता को जारी किया नोटिस
0 उत्तर प्रदेश शहरी नियोजित विकास अधिनियम की वैधता को चुनौती
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। सूबे में विकास प्राधिकरणों को समाप्त कर नगर निगमों और नगर पालिकाओं और पंचायतों की शक्तियां बढ़ाने की मांग पर हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है। इस मामले में एक जनहित याचिका दाखिल कर उत्तर प्रदेश शहरी नियोजित विकास अधिनियम को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। कोर्ट ने महाधिवक्ता को नोटिस जारी इस मामले में छह सप्ताह में सरकार का पक्ष रखने का निर्देश दिया है। मामले की सुनवाई 10 मई को होगी।
ओमदत्त सिंह की याचिका पर न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल और न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की पीठ सुनवाई कर रही है। याची की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रवि किरन जैन और दीबा सिद्दकी ने बहस की। कहा गया कि 1973 में अस्थायी व्यवस्था के तहत विकास प्राधिकरणों की स्थापना की गई। अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि प्राधिकरण जिस उद्देश्य के लिए गठित किए गए थे उनको पूरा कर सके या नहीं।
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विकास प्राधिकरणों को शहरी निकाय क्षेत्र और आठ किलोमीटर तक ग्रामीण क्षेत्र में विकास का अधिकार दिया गया था। अनुग्रह नारायण सिंह केस में हाईकोर्ट ने लोकन सेल्फ गर्वनेंस को प्रभावी करने का आदेश दिया है। इसके बावजूद स्थानीय निकायों को अधिकार नहीं दिए जा रहे हैं और विकास प्राधिकरणों को जारी रखा जा रहा है। यह नौकरशाही की देन है। संविधान ने स्थानीय निकायों के माध्यम से जनतांत्रिक और शासन व्यवस्था में जनभागीदारी का अधिकार दिया है। विकास प्राधिकरणों की वजह से इस अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। याचिका में मांग की गई है कि नगर निकायों की शक्तियों को बढ़ाया जाए।
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त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली को प्रभावी करने की मांग
प्रयागराज। याची ने इसी मामले में एक और जनहित याचिका के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 243(जेड)(डी)(1) के तहत त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली और जिला योजना समिति को प्रभावी बनाने की मांग की है। कहा गया कि नागरिकों को अपना विकास मॉडल तय करने और सामाजिक न्याय दिलाने में जनभागीदारी की संवैधानिक मंशा को लागू कराया जाए। याची का कहना है कि स्थानीय स्वशासन के तहत पंचायतों और निकायों की व्यवस्था की गई है। इसके तहत जिला योजना समिति की व्यवस्था भी संविधान में है। यह वित्त आयोग के समक्ष अपने विचार रखती है। मगर मौजूदा समय में कैबिनेट सुपर पावर बन गई है। आयोग को स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने दिया जा रहा है। विकास योजनाओं में जनभागीदारी के तंत्र को विकसित नहीं किया जा रहा है। इस मामले में भी छह सप्ताह में कोर्ट ने सरकार को पक्ष रखने के लिए कहा है।
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