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मुजफ्फरनगर दंगे के आरोपियों की जमानत खारिज

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मुजफ्फरनगर दंगे के दो आरोपियों की जमानत खारिज
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0 छह माह में मुकदमे का ट्रायल पूरा करने का आदेश
0 फुरकान और मुजम्मिल ने हाईकोर्ट में दी थी जमानत अर्जी
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
मुजफ्फरनगर में 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगे के दो आरोपियों की जमानत हाईकोर्ट ने नामंजूर कर दी है। दोनों की जमानत अर्जियां निरस्त करते हुए कोर्ट ने दंगे से संबंधित मुकदमे का ट्रायल छह माह में पूरा करने का अधीनस्थ न्यायालय को निर्देश दिया है। अभियुक्त मुजम्मिल उर्फ बिल्ला और फुरकान की अर्जी पर न्यायमूर्ति शशिकांत ने सुनवाई की। अदालत ने हिंदी दिवस के मौके को ध्यान में रखते हुए हिंदी में लिखाए निर्णय में कहा है कि यदि पुलिस या अभियोजन के अधिकारी मुकदमे के निस्तारण में आवश्यक सहयोग नहीं करते हैं तो उनके विरुद्ध उचित कार्रवाई का आदेश पारित किया जाए तथा मुकदमे में अनावश्यक तारीखें न दी जाएं।
जमानत अर्जी में अभियुक्तों की ओर से दलील दी गई कि कवाल कस्बे में 23 अगस्त 2013 को घटना हुई जिसमें अभियुक्तों के पक्ष से कलुआ और दूसरे पक्ष से सचिन और गौरव की हत्या हो गई। मुजम्मिल का कहना था कि वह 40 प्रतिशत विकलांग है। वह लंबे समय से जेल में बंद है तथा बीमार है।
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जमानत का विरोध करते हुए वादी के वकील अरुण कुमार मिश्र और अपर शासकीय अधिवक्ता विकास सहाय ने कहा कि अभियुक्तों ने गौरव और सचिन की हत्या पत्थर से बेरहमी से कूंच कर की है। हत्या में प्रयुक्त हथियार भी उनके कब्जे से बरामद हुए हैं। मुजम्मिल का विकलांगता प्रमाणपत्र घटना से कुछ महीने पहले बनवाया गया है तथा इससे पूर्व वह प्रमाणपत्र किसी भी अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया। उसका इलाज एम्स दिल्ली में कराया जा रहा है।
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सरकार के अधिवक्ता की दलील थी कि अभियुक्तों की ओर से जानबूझकर मुकदमा लंबित करने का प्रयास हो रहा है। इस मामले में दो गवाहों रवींद्र और जगदीश के बयान कराए जा चुके हैं। शेष गवाहों के बयान भी जल्दी करा दिए जाएंगे। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में जमानत देने का कोई आधार नहीं है। प्रार्थनापत्र खारिज करते हुए अवर न्यायालय को निर्देश दिया है कि ट्रायल छह माह में पूरा करने का प्रयास किया जाए तथा किसी भी पक्ष को अनावश्यक रूप से तारीखें न दी जाएं।
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