मानववाद पर आधारित है भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
0 इविवि के दर्शनशास्त्र विभाग में हुई गोष्ठी में बोले वक्ता
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। भारतीय संस्कृति में निहित मूल्यों एवं दर्शन को आधार मानकर राज्य व्यवस्था का संचालन आवश्यक होगा। ये बातें बुधवार को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग में ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय का सामाजिक एवं राजनीति दर्शन’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य अतिथि प्रक्षा प्रवाह पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार के संगठन मंत्री एवं चिंतक रामाशीष ने कहीं।
उन्होंने कहा कि दीनदयाल ने 20वीं सदी की तीन प्रमुख राजनैतिक विचारधाराओं का खंडन करके भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतिपादन किया। कहा कि स्वराज को सार्थक एवं सुराज बनाने के लिए पश्चिम का अंधानुकरण नहीं वरन राष्ट्रवाद का अनुगामी होना अनिवार्य है। विषय प्रवर्तन करते हुए गोष्ठी के संयोजक आचार्य हरिशंकर उपाध्याय ने कहा कि भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मानववाद पर आधारित है। इसके अंतर्गत पर्यावरण की सभी वस्तुओं का यथोचित स्थान एवं महत्व है। कहा कि राष्ट्र की आत्मा चिति है। राष्ट्र स्वयंभू है, वह कभी समझौते से उत्पन्न नहीं होता।
केंद्र सरकार के अतिरिक्त महान्यायावादी अशोक मेहता ने कहा कि दीनदयाल ने लिखा है कि राज्य के लिए संविदा संभव है लेकिन राष्ट्र के लिए नहीं। डॉ.उत्तम ने कहा कि राष्ट्र का प्राण तत्व धर्म है। विभागाध्यक्ष प्रो.ऋषिकांत पांडेय ने कहा कि भारत धर्मपरायण राष्ट्र है, यह न तो मजहबी राज्य है और न धर्म विरोधी राज्य। पूर्व आईएएस ओम प्रकाश ने भी विचार व्यक्त किए। अध्यक्षता पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो.जटाशंकर तथा संचालन श्रीमती प्रवीण शुक्ल ने किया। इसमें प्रो.देवाशीष गुहा, डॉ.नीलिमा मिश्रा, डॉ.आशालाल, डॉ.अविनाश कुमार श्रीवास्तव, डॉ.उत्तम सिंह. डॉ.अजय उपाध्याय आदि मौजूद थे।