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परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर मिली उम्रकैद की सजा माफ

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परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर मिली उम्र्रकैद की सजा माफ
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अपराध साबित करने के लिए घटनाओं की क्रमबद्धता साबित करना जरूरी: हाईकोर्ट

अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
हाईकोर्ट ने परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर हत्या के मामले में दी गई उम्रकैद की सजा माफ कर दी है। कोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मामले में घटनाओं की क्रमबद्धता का साबित होना जरूरी है। ऐसे नहीं होने पर अभियुक्त को संदेह का लाभ मिलता है।
इलाहाबाद के सरायइनायत थानाक्षेत्र के हाजीपुर गांव के मंटी लाल की जेल अपील को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति अरविंद कुमार मिश्र प्रथम और न्यायमूर्ति दयाशंकर त्रिपाठी की पीठ ने यह आदेश दिया।
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मंटी लाल को अपर जिला एवं सत्र न्यायालय इलाहाबाद ने 13 सितंबर 2011 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उस पर अपने गांव के ही मुन्ना बिंद की भाभी उर्मिला बिंद की हत्या का आरोप था। घटना पांच अक्तूबर 2010 की है। प्राथमिकी में कहा गया कि उर्मिला घटना वाले दिन शाम करीब छह बजे खेत की ओर गई थी। फिर वापस नहीं आई। अगले दिन सुबह खेत में उसकी लाश बरामद हुई। पोस्टमार्टम में गला घोंट कर हत्या किए जाने की बात सामने आई। अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ पुलिस प्राथमिकी दर्ज कर जांच की।
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अभियुक्त मंटीलाल घटना के पांच दिन बाद गिरफ्तार किया गया। उसके घर से मृतका के चांदी के गहने पुलिस ने बरामद किए। आरोप था कि मंटी ने दुष्कर्म के प्रयास में असफल होने पर हत्या कर दी। मंटी लाल आर्थिक तंगी के कारण अपना पक्ष रखने के लिए वकील नहीं खड़ा कर सका लिहाजा कोर्ट ने लालचंद्र मिश्र को उसका न्यायमित्र नियुक्त किया। हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद पाया कि पुलिस की थ्योरी में कई खामियां हैं। अभियुक्त की गिरफ्तारी, उसके घर से गहनों की बरामदगी, गवाहों के बयान आदि में विरोधाभास है। पूरा घटनाक्रम क्रमबद्धता के साथ सामने नहीं आ सका जिससे कहा जा सके कि मंटीलाल ही हत्यारा है। हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा माफ करते हुए अभियुक्त को रिहा करने का आदेश दिया है।
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