नार्थ वेस्टर्न प्रांविसेज एवं अवध लेजिस्लेटिव कौंसिल में नौ सदस्य हुआ करते थे। इन्हें लेफ्टिनेंट गवर्नर नामित करता था। इनमें चार कार्यालयीन तथा पांच अकार्यालयी सदस्य होते थे। चार कार्यालयीन सदस्य वायसराय विधान परिषद के सदस्य जेडब्ल्यू क्विंंटन, स्थानीय सरकार के मुख्य सचिव जे.बुडबर्न, लखनऊ के कमिश्नर एमएएमसी कानथे तथा सरकार के विधि परामर्शी जीई नाक्स थे। वहीं जनप्रतिनिधि के तौर पर चयनित सदस्य गृह सरकार के प्रतिनिधि टी.कालिन, अवध के तालुकेदार राजा प्रताप नारायण सिंह, वायसराय विधान परिषद के सदस्य मुस्लिम प्रतिनिधि सर सैयद अहमद खान, गोरखपुर के जमींदार और मानद मजिस्ट्रेट राय बहादुर दुर्गा प्रसाद तथा अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता पंडित अयोध्या नाथ थे। हालांकि इनके ज्यादातर सदस्यों का चयन अंग्रेजी सरकार करती थी। इसलिए वे अंग्रेजों की बात ही करते थे। इसलिए उन दिनों कौंसिल को ‘सुनहरा स्वांग’ कहा गया। नौ सदस्यों में अयोध्या नाथ ही थे, जिन्होंने बैठक में हर प्रस्ताव पर अपनी बात रखी थी। इसलिए उन्हें पहला बागी सदस्य कहा गया था।
1887 की बैठकों में रखे गए प्रस्ताव
1887 में हुई विधानमंडल की बैठक में बिल ऑफ शार्टिंग द लैंग्वेज यूज्ड, एक्शन ऑफ द कौंसिल प्रस्ताव रखे गए। पहला गैर सरकारी विधायक ‘प्रिवेंशन ऑफ क्रूइल्टी टू एनिमल बिल’ पं.अयोध्या नाथ ने सदन के पटल पर रखा। हालांकि यह स्वीकृत नहीं हो सका।
116 वर्ष बाद 2003 में हुई थी बैठक
नार्थ वेस्टर्न प्राविंसेज एंड अवध विधानमंडल की पहली बैठक की स्मृति में आठ जनवरी 2003 को पब्लिक लाइब्रेरी परिसर में उत्तरशती समारोह का आयोजन हुआ। चूंकि, बैठक में करीब 600 सदस्यों को शामिल होना था, इसके विपरीत लाइब्रेरी के अध्ययन कक्ष (1887 में इसी में बैठक हुई थी) में इतने लोगों के बैठने की व्यवस्था नहीं थी। इसलिए हॉल के बाहर समारोह का आयोजन हुआ। साथ ही सदन भी बैठी, जिसमें कई बिंदुओं पर चर्चा हुई तो नेताओं ने एक दूसरे पर कटाक्ष भी किए। बैठक में तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री, मुख्यमंत्री मायावती, विधानसभा अध्यक्ष केशरीनाथ त्रिपाठी, विधान परिषद के कार्यकारी सभापति कुंवर मानवेंद्र सिंह, कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी समेत अनेक मंत्रियों तथा विधायकों ने हिस्सा लिया था।