अमर उजाला अपराजिता-100 मिलियन स्माइल्स अभियान के तहत विशेष तौर पर नवरात्र में ‘मेरी शक्ति, मेरा संकल्प’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन गुरुवार को अमर उजाला ताला नगरी कार्यालय पर किया गया। अलग अलग क्षेत्र से जुड़ी महिलाओं ने परिचर्चा में अपने-अपने विचार रखे। मौजूदा समाज में महिलाओं की दिशा और दशा पर भी चर्चा हुई।
सामाजिक कार्यकर्ता सुरभि अग्रवाल ने कहा कि अपने जीवन में बहुत कुछ देखा है और कठिन व विपरीत स्थितियों का सामना भी किया है, लेकिन वह अपनी बेटी के लिए ऐसी स्थितियां बनाएंगी जिससे बेटी को अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करने में मदद मिले। किसी भी महिला के लिए उसका आत्मविश्वास ही उसकी शक्ति है। यही उसे मजबूत बनाती है। वह परिवार में बेटी और बेटे में कोई भी फर्क नहीं करती हैं।
ज्वैलरी डिजाइनिंग से जुड़ीं सोनिका सिंह ने कहा कि वह सकारात्मक ऊर्जा को बहुत ही महत्वपूर्ण मानती हैं। इससे जीवन में आगे बढ़ने का हौसला मिलता है। महिलाओं में आत्मविश्वास सर्वाधिक जरूरी है। महिलाओं को तनाव कम करने का प्रयास करते रहना चाहिए। इसके लिए योग अथवा अन्य कोई शारीरिक क्रिया करते रहना चाहिए।
शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र से जुड़ीं आरती मित्तल ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अपनी बेटी को वह जूता दीजिए जिससे उसे उड़ान भरने में आसानी हो। इसका अर्थ है कि वह स्थितियां, मार्गदर्शन, शिक्षा आदि दें जिससे वह अपनी क्षमता का शत प्रतिशत हासिल करे और आत्मनिर्भर बने। इसके अलावा जो महिलाएं सक्षम हैं उन्हें अपने आसपास की महिलाओं को भी सक्षम बनाना चाहिए। प्रगतिशीलता के साथ साथ सामाजिक परंपराओं के निर्वहन का भी ध्यान रखना चाहिए।
कविता और साहित्य से जुड़ीं लेखिका नीता पोरवाल ने कहा कि दुर्गा का नाम शक्ति है। जब असुरों से युद्ध हुआ तो दो दुर्गा कई रूपों में लड़ रही थीं। उन्हें चुनौती दी गई कि अकेले लड़ो तो परास्त कर देंगे। इस पर दुर्गा ने कहा कि यह मेरे ही रूप हैं। इस प्रकार एक महिला के अंदर भी शक्ति के कई रूप पाए जाते हैं, जबकि उसका भौतिक स्वरूप एक ही है। उन्होंने अपनी ‘प्रिय पुकारो खुद को’ शीर्षक से लिखी कविता का भी उल्लेख किया।
रेडियो जाकी (आरजे) के क्षेत्र से जुड़ीं कल्पना जादौन ने कहा कि उनके पिता उनको बचपन में लक्ष्मीबाई समेत अन्य वीरांगनाओं के विषय में बताते थे। इससे उन्हें आगे बढ़ने का दृष्टिकोण मिला। वह एक गांव से हैं और शिक्षा के लिए उन्हें शहर आना होता था। जब कक्षा छह में एएमयू में प्रवेश लिया तो गांव के कुुछ लोगों ने कहा कि लड़की को पढ़ा कर क्या करोगे? लेकिन उनके पिता ने उनमें भरोसा दिखाया और उनको कैरियर बनाने में मदद की। कभी गांव से वह साइकिल से शहर आती थीं। बाद में स्कूटी से आने लगीं। ऐसा करने वाली वह गांव की पहली लड़की थीं। अब उनके नक्शे कदम पर चलते हुए गांव की चार अन्य लड़कियां भी स्कूटी से शहर पढ़ने आती हैं। यह देखकर अच्छा लगता है। यह सकारात्मक परिवर्तन है।