मुशायरे में एक दर्जन से अधिक चुनिंदा शायर, पर श्रोता मात्र दो...ऐसा कभी कोई मुशायरा देखा-सुना है। मगर यह चमत्कार कर दिखाया था हरदिल अजीज शायर निदा फाजली ने। उन्हाेंने अपने साथी शायरों के लिए यह विशेष आयोजन बस द्वारा दिल्ली से जयपुर के थका देने वाले सफर को हलका करने के लिए किया था।
निदा फाजली को याद करते हुए यह दिलचस्प किस्सा सुनाया प्रसिद्घ शायरा रिहाना शाहीन ने। उन्हें याद कर प्रख्यात गीतकार पद्मभूषण गोपाल दास ‘नीरज’ ने भी अपनी यादें ताजा कीं। निदा फाजली के निधन को उनके साथ लंबे समय तक मुशायरों में शिरकत करने वाले गीतकार एवं शायरों ने व्यक्तिगत एवं साहित्य जगत के लिए बड़ी क्षति बताया है।
रिहाना शाहीन बताती हैं कि उन्होंने निदा फाजली के साथ लुधियाना, मुंबई, बंगलुरू, दिल्ली, जयपुर सहित देश के अनेक शहरों में आयोजित मुशायरों में मंच साझा किए हैं। उनका स्वभाव बेहद हंसमुख था। लेकिन कभी कभी संजीदा हो जाया करते थे। जयपुर मुशायरे का एक किस्सा बयां करते हुए रिहाना शाहीन कहती हैं कि एक बार हम शायर बस से जयपुर मुशायरे के लिए जा रहे थे।
सफर की थकान, खामोशी और नीरसता को तोड़ने के लिए निदा साहब ने नायाब तरीका ढूंढ निकाला। उन्हाेंने सभी शायर को एक- एक गजल सुनाने का मशवरा दिया। बस में निदा और उनके अलावा बेकल उत्साही, मौज रामपुरी, मखमूर सईदी, शबीना अदीब, जौहर कानपुरी, पॉपुलर मेरठी, मुमताज आदि शायर सवार थे। निदा फाजली के इतना कहते ही बस में मुशायरा शुरू हो गया।
अलग बात है कि इन बड़े शायरों को सुनने के लिए श्रोता के रूप में मात्र दो व्यक्ति ड्राइवर और कंडक्टर थे। शायरों को उनकी शायरी की समझ पर कुछ शक हुआ। इसपर मैंने ड्राइवर से पूछा कि क्या उसे गजलें समझ में आ रही हैं। ड्राइवर बेहद खुश था और हंस रहा था। उसने कहा कि कुछ समझ आ रही हैं कुछ नहीं, लेकिन जिस तरह पढ़ी जा रही हैं (तरन्नुम से), वह बहुत अच्छा लग रहा है। जयपुर का सफर कब पूरा हुआ, पता ही नहीं चला।