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बिसार दिए विसरा..168 मौतों के राज पर अभी तक पर्दा

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सीएमओ डॉ. एमएल अग्रवाल। - फोटो : CITY OFFICE
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अभिषेक शर्मा
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संदिग्ध हालत में हुई मौत को दो साल बीत गए, मगर विसरा रिपोर्ट के कारण अभी तक परिवार इस बात से अंजान हैं कि आखिर मौत की वजह क्या थी? ऐसा अमूमन उन प्रकरणों में होता है, जिनमें शव के पोस्टमार्टम के दौरान कारण स्पष्ट न होने पर विसरा संरक्षित किया जाता है और उसे जांच के लिए राज्य विधि विज्ञान प्रयोगशाला आगरा भेजा जाता है।
सालाना औसत के अनुसार 100 से 150 के मध्य विसरा अपने जिले से परीक्षण के लिए वहां भेजे जाते हैं। पिछले दो साल में अभी 64 विसरा ऐसे हैं, जिनकी रिपोर्ट पुलिस को नहीं मिली है, जिसके कारण मौत की गुत्थी अनसुलझी पड़ी है। वहीं काफी पुराने 104 केस ऐसे हैं, जिनकी रिपोर्ट तैयार हैं। मगर पुलिस उन्हें लेने नहीं पहुंची है। हालांकि जिन केसों में कानून व्यवस्था की दृष्टि से तत्काल रिपोर्ट मंगाया जाना जरूरी है, उनमें पुलिस द्वारा जल्द से जल्द प्रयास कर रिपोर्ट मंगा ली जाती है, मगर जिन केसों में पैरवी शिथिल है, उनमें रिपोर्ट के स्वत: आने का इंतजार रहता है।
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यह है विसरा संरक्षण की प्रक्रिया
शराब, जहरखुरानी या विषाक्त पदार्थ खाने की स्थिति या संदिग्ध हालात में हुई मौत की गुत्थी पोस्टमार्टम के दौरान जब डॉक्टर नहीं सुलझा पाते हैं तो उसका विसरा संरक्षित किया जाता है। इस दौरान पेट में मिले खाद्य पदार्थ के अलावा, लिवर का टुकड़ा, किडनी, तिल्ली, खाने की थैली, छोटी आंत का टुकड़ा विशेष केमिकल के साथ संरक्षित कर उसे जार में रखा जाता है। तत्काल पोस्टमार्टम डॉक्टर द्वारा शव को लाने वाले थाने के दरोगा से जार मंगवाया जाता है और उसे पुलिस को ही सौंप दिया जाता है। पुलिस स्तर से इसे एक-दो दिन में डॉकेट नंबर के साथ आगरा प्रयोगशाला में रिसीव कराया जाता है। अमूमन तीन से छह माह में रिपोर्ट मिलने का प्रावधान है। मगर प्रयोगशाला में काम का बोझ अधिक होने के कारण इनकी रिपोर्ट मिलने में देरी हो रही है।
पुलिस रिकार्ड में 64 विसरा रिपोर्ट लंबित
पुलिस के अनुसार अपने जिले की पिछले वर्ष की 9 और चालू वर्ष की 55 रिपोर्ट आगरा विधि विज्ञान प्रयोगशाला से आना शेष हैं। जिसके कारण इन मुकदमों का निस्तारण नहीं हो पा रहा है। प्रत्येक तिमाही विवेचनाओं के अर्दली रूम के दौरान विवेचक स्तर से उच्च अधिकारियों को केस लंबन पर सवाल खड़ा होने पर विसरा रिपोर्ट न आने का हवाला दिया जाता है। इस पर अधिकारियों के स्तर से केस की जरूरत को ध्यान में रखते हुए प्रयोगशाला में संपर्क किया जाता है। रिमाइंडर भेजे जाते हैं। जिन केसों में रिपोर्ट जल्दी मंगाना जरूरी समझा जाता है, उनमें तत्काल सिफारिश लगाई जाती है।
12 साल से जिले में नहीं रखे जा रहे संरक्षित विसरा
यह वाकया वर्ष 2007 का है, जब यहां पोस्टमार्टम केंद्र के पीछे के तालाब में काफी संख्या में नरकंकाल मिलने पर बखेड़ा खड़ा हो गया था। अधिकारियों का ध्यान पोस्टमार्टम केंद्र पर गया तो उस समय यह बात उजागर हुई कि पुलिस लावारिस शवों का अंतिम संस्कार से बचने के लिए रात में तालाब में फेंक देती है। तभी यह भी पाया कि पोस्टमार्टम केंद्र में काफी संख्या में विसरा संरक्षित हैं। उसी समय अधिकारियों की सहमति पर यह तय हुआ था कि अब जिले में कोई विसरा संरक्षित करके रखा नहीं जाएगा, बल्कि तत्काल उसे यहां से आगरा भेज दिया जाएगा।
जिले की 104 रिपोर्ट आगरा में हैं लंबित, नहीं मंगा रही पुलिस
बेशक जिला पुलिस के आंकड़ों के अनुसार जिले की पिछले दो साल की 64 रिपोर्ट आगरा में लंबित हैं, मगर आगरा विधि विज्ञान प्रयोगशाला सूत्रों की मानें तो अलीगढ़ जिले की काफी पुरानी 104 रिपोर्ट आगरा में तैयार हैं, जिन्हें अलीगढ़ पुलिस लेने नहीं पहुंच रही है। इससे साफ है कि अपने जिले की 168 रिपोर्ट आगरा में लंबित हैं। इनमें पुलिस अपने लिए 64 को ही जरूरी बता रही है। मगर आगरा में अलीगढ़ जिले की 104 रिपोर्ट तैयार हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं कि अपने जिले की 168 विसरा मौतों का राज अनसुलझा है।
वर्ष पोस्टमार्टम जांच को बिसरा प्रिजर्व
2017 1698 140
2018 1750 120
2019 1700 125
यह अनुमानित आंकड़ा पोस्टमार्टम/पुलिस रिकार्ड से जुटाया है।
-अलीगढ़ सहित प्रदेश के कई जिलों में विसरा संरक्षित करके नहीं रखा जाता है। अब सीधे प्रयोगशाला भेजा जाता है। इसे भेजने और रिपोर्ट मंगाने का काम पुलिस स्तर से पूरा किया जाता है। हमारे स्तर से सिर्फ विसरा संरक्षित किया जाता है।
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-डॉ.एमएल अग्रवाल सीएमओ
-जिन प्रकरणों में रिपोर्ट तैयार हैं, उन्हें जल्द मंगाया जाएगा और जिनकी रिपोर्ट लंबित हैं। उनकी जानकारी कर विधि विज्ञान प्रयोगशाला से जल्द रिपोर्ट मंगाई जाएगी। ताकि जल्द से जल्द लंबित प्रकरणों का निस्तारण कराया जा सके।
-आकाश कुलहरि एसएसपी
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