सियासी रण में एक महीने तक मंचों-जनसंपर्कों में उठा मुद्दों का शोर बृहस्पतिवार को गायब था। बस जातीय समीकरण और ध्रुवीकरण का शोर मचा हुआ था। मतदान को लेकर गजब का उत्साह था और वजह सिर्फ जात-पात या ध्रुवीकरण से जुड़ी थी। हां, सुबह कोहरे की चादर ने जरूर रफ्तार थामी थी। मगर, धूप खिलने के बाद चाहे युवा हों या बुजुर्गवार सभी ने मतदान के लिए अंगड़ाई ले ली थी। फिर मतों की जो बौछार हुई, दावेदारों के भी चेहरे खिलते चले गए और शाम होते-होते जमकर मतदान ने अच्छे परिणामों की ओर इशारा भी कर दिया।
जिले में प्रथम चरण में चुनाव होने के एलान के साथ ही सियासी सूरमाओं ने बिसात बिछाना शुरू कर दिया था। लगातार एक महीने तक हर तरफ मात देने के लिए मोहरों के जरिये सह दी जा रही थी। लगातार मुद्दे उछाले जा रहे थे। इन मुद्दों के जरिये एक दूसरे की कमियां उजागर की जा रही थीं। चाहें सियासी दिग्गजों का मंच हो या सियासी मोहरों का जनसंपर्क हो। उन मुद्दों को जोर शोर से उठाया जा रहा था, जिनके जरिये एक दूसरे की दुखती नब्ज को दबाया जा सके। उम्मीद थी कि चुनाव के दिन ये मुद्दे स्पष्ट तौर पर नुमाया होंगे। मगर वे सभी मुद्दे बृहस्पतिवार को गौण ही दिखे।
11 बजे के बाद शुरू हुआ मतदान का सफर -
वैसे तो कमोबेश जिले का एक जैसा ही हाल दिखा। मगर बात अगर शहर सीट से शुरू करें तो सुबह कोहरे की चाद होने के कारण अधिकांश बूथों पर सन्नाटे जैसी स्थिति थी। मगर 10 बजते-बजते तस्वीर बदलने लगी और धूप भी खिलने लगी। तस्वीर भी सीधे-सीधे ध्रुवीकरण के चलते आमने-सामने की दिखी। कहीं एक तरफ के बूथों पर भीड़ अधिक थी तो कहीं दूसरी ओर के बूथों पर भीड़ ज्यादा थी। नजारा लगभग एक जैसा था। दोपहर होते होते तो माने कोई संदेश प्रसारित हुआ और दोनों ओर उत्साह जैसा माहौल मतदान के लिए बन गया। इसी तरह शहर की दूसरी सीट कोल पर माहौल बना। शुरुआत में जरूर लगा कि मसला कहीं किसी एक पक्ष में तो नहीं बन रहा। जब मतदाताओं का मन टटोला गया तो तस्वीर त्रिकोणीय थी। वह भी जातीय गणित और पार्टी से जुड़े रिश्ते-नातों को लेकर। कोल के शहर व देहात में दो चेहरे और सिविल लाइंस व उसके इर्द-गिर्द इलाके में दो चेहरे आमने सामने दिखे।
इससे आगे जब बरौली की ओर रुख करते हैं तो यहां हर तरफ जातीय रंग दिखाई दिया। कहीं कोई अपनी जाती को लेकर मतदान करता दिखा तो कहीं कोई अपने मजबूत रिश्तों को लेकर मतदान कर रहा था। मुद्दे भी कुछेक जगह थे तो वे अपने गांव या क्षेत्र से जुड़े। निजी खलिस वाले मुद्दों पर प्रत्याशी से दुराभाव देखने को मिला। इसी तरह अतरौली में जातीय गणित दो दावेदारों के बटन पर सवार दिखाई दिया। यहां इन दोनों से आगे कोई नाम लेता भी नहीं दिखा। छर्रा में भी तस्वीर कुछ इसी तरह थी। तीसरा दावेदार भी कुछ जगह सेंधमारी करता दिख रहा था। मगर टक्कर आमने-सामने की होती दिख रही थी। शेष बचे जिले के जाटलैंड की इगलास में भी आमना सामना जातीय गणित से जुड़ा था और खैर में भी जातीय गतिण ने मुकाबला त्रिकोणीय बना रखा था।
अपनों में तलाशते दिखे मुद्दों के खिलाफ प्रहार
बात हमें चाहे शहर की तंग गलियों या बाजारों की करें या फिर गांव पगडंडी और खेत खलिहानों की करें। तरुणाई से लेकर बूढ़ी आंखों तक वोट को लेकर गजब का उत्साह था। सुनहरे भविष्य के सपने थे। मगर अपनों में मुद्दों के खिलाफ प्रहार पहुंचाने की कुव्वत तलाशी जा रही थी। इस दौरान पहली बार मतदान की खुशी किसी को बेहद आनंदित करती दिख रही थी। जब सवाल पूछा तो एक ही जवाब मिला कि कुछ अच्छा करेंगे। जिन्हें हम अपना मान रहे हैं, उन्हीं से उम्मीद है। घर-परिवार के सहारों या बेटों के कंधों के सहारे मतदान को पहुंचे बुजुर्गों में भी गजब का उत्साह था। मगर बात एक ही सुनने को मिल रही थी कि वही हमारा है। अब बात जो हो, काम कैसा भी हो, उसके लिए मतदान बेहद जरूरी है।