प्रदेश में चल रहे विधानसभा चुनावों के बीच अचानक हुई गधे की एंट्री के साथ ही गधे की वर्तमान में उपयोगिता पर भी चर्चा छिड़ गई है। यातायात और ट्रांसपोर्टेशन की आधुनिक तकनीकों के मौजूद होने के साथ ही आज भी कई ऐसेे परिवार हैं, जिनके लिए गधा उनकी आजीविका का एक मात्र आधार बना हुआ है। ऐसे ही एक परिवार से अमर उजाला ने बातचीत की। इस बातचीत में गधा और उसके मालिक के बीच कुछ संवेदनशील संबंध भी उभर कर आए।
जयगंज के मोहल्ला लड़िया निवासी मेघ सिंह की उम्र 75 वर्ष है। उनके पिता दुर्गा दास भी गधे से मिट्टी ढोने और ईंट ढोने का काम करते थे। पिता के बाद उन्होंने भी यही काम शुरू किया। उनके पास पिछले करीब छह साल से एक गधा है। वह इस गधे के सहारे एक दिन में 300 से 400 रुपये कमा लेते हैं, जिससे उनका और गधे का पेट भर जाता है। एक तरह से गधा अपना पेट भरने के लिए मेघ सिंह पर निर्भर है और मेघ सिंह अपनी आजीविका के लिए गधे पर निर्भर हैं। इस प्रकार दोनों एक दूसरे के लिए जी रहे हैं।
मेघ सिंह कहते हैं कि एक बार उन्हें बुखार आ गया और वह काम पर नहीं जा सके। इसका अहसास गधे को भी हो गया। गधे ने एक दिन पानी भी नहीं पिया। शाम को बड़ी मुश्किल से गधे ने कुछ खाया। उन्होंने बताया कि उनके बच्चे अब इस काम को नहीं करते हैं, लेकिन यह सच है कि पूरा परिवार इस गधे और इससे पहले दूसरे गधों की मेहनत से ही पला है। इसलिए हम गधे के नाम का उपहास नहीं उड़ा सकते हैं। दर असल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अमिताभ बच्चन से अपील की थी कि वे गुजरात के गधों का प्रचार न करें।