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मां-बेटियों का मर्डर: तीन की हत्या, दो लाश मिलीं वो किसकी थीं, 20 साल में साबित न कर पाई पुलिस

Mon, 03 Mar 2025 01:15 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़

सार

पुलिस ने जो कहानी गढ़ी, उसके आधार पर 20 वर्ष बाद अदालत में न तो हत्या साबित हुईं। न ये साबित हुआ कि दोनों लाशें उन्हीं बेटियों की थीं। इस पर अदालत ने हत्याकांड के एक दर्जन आरोपी बरी कर दिए हैं।
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पुलिस - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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लोधा के गांव भीमपुर इब्राहिमपुर में बीस वर्ष पहले सनसनीखेज वारदात में मां व दो मासूम बेटियों की अपहरण के बाद हत्या कर दी गई। कुछ दिन बाद दोनों लाश हरियाणा से मिली। एक लाश आज तक नहीं मिली। पुलिस ने जो कहानी गढ़ी, उसके आधार पर 20 वर्ष बाद अदालत में न तो हत्या साबित हुईं। न ये साबित हुआ कि दोनों लाशें उन्हीं बेटियों की थीं। इस पर अदालत ने हत्याकांड के एक दर्जन आरोपी बरी कर दिए हैं।

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तिहरे हत्याकांड की कहानी
गांव भीमपुर इब्राहिमपुर के राजेंद्रपाल सिंह ने 30 दिसंबर 2005 की देर रात लोधा थाने में मुकदमा दर्ज कराया कि वह शाम साढ़े छह बजे अपने तहेरे भाई ध्यानपाल संग गोंडा से गांव आ रहा था। तभी गांव में घुसते ही उसने फायरिंग की आवाज सुनी। तभी उसके दो बेटे 12 व 9 वर्षीय क्रमश: राजेश व अंसू दौड़ते हुए आए और मुझे देखकर बोले कि चाचा-चाची व उनके परिजन अन्य साथियों ने मां-बहनों गोली मार दी है। ईंटों से कुचला है। तीनों को खींचकर खेतों की ओर ले गए हैं। इस आधार पर नामजदों पर पुलिस ने राजेंद्र की पत्नी विरमा, बेटियां क्रमश: 12 वर्षीय सुषमा व 6 वर्षीय चंद्रकांता के अपहरण व हत्या, हमला आदि धाराओं में दर्ज किया।

विवेचना के दौरान तत्कालीन एसओ लोधा ने बल्लभगढ़ में 21 जनवरी 2006 व पलवल में 1 फरवरी 2006 को क्रमश: 6 व 3 वर्ष की अज्ञात बच्चियों के मिले शवों को की पहचान कपड़ों व फोटो आदि के आधार पर क्रमश: सुषमा व चंद्रकांता के रूप में कर ली। विवेचना में पहचान पिता द्वारा कराया जाना भी दिखाया गया। मां विरमा देवी की लाश गांव के कुछ दूरी की नहर में बहाया जाना मानकर उसके खून से सने कुछ कपड़े आदि बरामद दिखाकर तीनों की अपहरण, हत्या, हमला आदि धाराओं में आरोपियों को अलग अलग जगह से जेल भेजकर 12 लोगों पर 2006 में चार्जशीट दायर कर दी।

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ये हुआ अदालत में

अदालत में अलग अलग टुकड़ों में आई चार्जशीट एक जगह की गईं। 2022 में ट्रायल शुरू हुआ। ट्रायल के दौरान वीरेंद्र नाम के एक आरोपी की मृत्यु हो गई, जबकि ओमप्रकाश व बबलू काफी समय से गायब रहे। इसलिए इनकी पत्रावली अलग कर दी गई। इसके बाद 12 गवाह पेश किए गए, जिनमें सबसे पहले गवाह वादी राजेंद्र पाल की प्रारंभिक गवाही व प्रारंभिक जिरह के बाद लगातार अनुपस्थिति रही। इसके बाद मुकदमा लेखक एसआई, गांव के चार चश्मदीद गवाहों के अलावा हरियाणा में मिले शवों के पोस्टमार्टम करने वाले फरीदाबाद के दो चिकित्सक, हरियाणा के दो पुलिसकर्मी, विवेचक एसओ लोधा, हथियार बरामदगी मुकदमे के विवेचक दरोगा की गवाही हुई। साथ में 26 दस्तावेजी साक्ष्य भी पेश किए गए।

साबित नहीं हो सकी कहानी
हरियाणा के पुलिसकर्मी, विवेचक रहे एसओ लोधा ये साबित नहीं कर सके कि दोनों शव सुषमा व चंद्रकांता के ही थे। उनकी उम्र व चोटों के निशान से भी ये साबित नहीं हुआ। अदालत में बचाव पक्ष ने जोर दिया कि जिन दो बेटों ने घटना देखी, उन्हें भी गवाही के लिए बुलाया जा सकता है। मगर इनके अदालत में न आने के कारण उसकी गवाही का समय समाप्त किया। विवेचक एसओ के बयानों को भी विरोधाभाषी माना गया। इन तमाम तथ्यों व पुलिस की कमजोर कहानी के आधार पर सभी आरोपी बरी कर दिए गए।
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पुलिस की कमी पर होगा पत्राचार

एडीजीसी तरुण वर्मा के अनुसार इस मामले में पुलिस स्तर से वादी को नहीं खोजा जा सका। पुलिस कहानी के आधार पर साक्ष्य बेहद कमजोर थे। इन्हीं तमाम पहलुओं पर मुकदमा बरी हुआ है। इसके लिए ऐतराज पत्राचार व अपील दोनों की प्रक्रिया होगी। वहीं बचाव पक्ष के अधिवक्ता योगेंद्र शर्मा ने माना है अदालत ने उनकी दलीलों पर निर्णय सुनाया है।

पिता की हत्या में आरोपी है गायब वादी
अपनी पत्नी व बेटियों की हत्या के मुकदमे में गवाही के बीच से गायब हुआ वादी राजेंद्र पाल सिंह पर इस तिहरे हत्याकांड से करीब छह माह पहले अपने पिता की हत्या का आरोप लगा था। पिता की हत्या का मुकदमा जब निर्णय के करीब आया, तभी वह गायब हो गया। अपनी पत्नी व बेटियों के मुकदमे में गवाही तक देने नहीं आया। पिता की हत्या के मुकदमे में उसके दो सहयोगियों को सजा हो चुकी है।

ये आरोपी किए गए बरी
वादी का सगा भाई सत्यपाल, उसकी पत्नी सुनीता, परिवार की धर्मवती उर्फ सुमन, राकेश, मुनेश, गौमत का कालीचरण, तालसपुर का नईम, ईकरी का रईस, पारली बुलंदशहर का नरेंद्र, नगला पटवारी का नन्ने, अनवार उर्फ बुंदे अली, राहुल।
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