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त्रिदेव के चक्कर में घनचक्कर बने उम्मीदवार

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अलीगढ़। पंचायत चुनावों में दिनोंदिन त्रिदेव की सक्रियता बढ़ती जा रही है..। अकराबाद के गांव मनाई में शनिवार को एक प्रत्याशी के चुनाव प्रचार में पैसे बांटे गए तो जबरदस्त विरोध हुआ। दो गुटों के दर्जनों समर्थकों के बीच गालीगलौज और मारपीट हुई। सरेआम हुई इस भिड़ंत की खबर पुलिस तक पहुंची लेकिन सत्ता का खौफ ऐसा कि पुलिस सब कुछ कान में ही हजम कर गई..। पूछा तो वही पुलिसिया अंदाज ए बयां कोई सूचना नहीं मिली..। खैर.. देर रात ये शिकायत जिलाधिकारी/ जिला निर्वाचन अधिकारी को भी पहुंचा दी गई। दरअसल, अब कहासुनी, गालीगलौज, मारपीट, फायरिंग की घटनाएं पंचायत चुनाव के परवान चढ़ने के साथ शबाब पर आएंगी। कारण साफ है-अगर अभी से खौफ नहीं बना तो बाद में 27 का जादुई आंकड़ा जुटना मुश्किल न हो जाए। इन दिनों सपा के दो नेताओं का चुनाव सबसे ज्यादा चर्चा में है। जिसको लेकर सपा भी अंदरखाने दो खेमों में बंट गई है। पहला खेमा पुराने तजुर्बे और वर्तमान में दो जनप्रतिनिधियों की नीतियों पर चल रहा है।
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 यहां जातिगत समीकरण फिट हो रहा है जाटलैंड का साथ मिला तो बात बन सकती है। सपा का ही दूसरा खेमा एक जनप्रतिनिधि और समर्थकों के सहारे पांव पसार रहा है। ये वही खेमा है जिसने अपने विधानसभा चुनाव में टिकट लेने में इतिहास रच दिया था। वर्तमान में इस खेमे का रसूख हर तरफ चर्चा में है। सपा के दो गुटों के बाद तीसरा गुट विपक्षी बसपा के खेमे से है। बसपा के एक रसूखदार नेता का चुनाव खामोशी के साथ जारी है। अंदरखाने प्रचार प्रसार जारी है। मतदाताओं को भरोसा दिलाया जा रहा है कि उनका भविष्य और सम्मान इसी खेमे में सुरक्षित है। अधिकांश प्रत्याशी सरकार के नेताओं को नाराज नहीं करना चाहते। क्योंकि अगर वह जीते तो सरकार के सहारे से ही ‘भला’ होगा।
 अन्यथा चुनाव में इतनी माथापच्ची मेहनत और खर्च बेजा हो जाएगा। शायद इसीलिए दिन रात चुनाव प्रचार कर रहे जिला पंचायत सदस्य प्रत्याशियों को अब इन ‘त्रिदेव’ की दहशत सताने लगी है। कहीं चुनाव जीतने के बाद उन्हें अध्यक्ष पद की वोटिंग से पहले ‘नजरबंद’ न कर लिया जाए। उन्हें तयशुदा धनराशि नहीं मिली तो क्या करेंगे..? जिताऊ सदस्य अभी से अपने गुरुओं की ‘शरण’ में पहुंच रहे हैं। तजुर्बेकार नेता तो गोटियां सेट कर लेंगे, लेकिन नए प्रत्याशियों के सामने भ्रम की स्थिति है। 
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