पुलिस चोरी जैसे अपराध में अपराधियों को हर कीमत पर पकड़ने और माल बरामद करने का दावा करती है। मगर, विवेचकों के स्तर विवेचनाओं का बोझ कम करने की दशा में कदम उठाकर एक ही अपराध में पकड़े गए अपराधियों पर अन्य मुकदमे खोल दिए जाते हैं। यह दिखा दिया जाता है कि चोरी का माल बरामद नहीं हुआ। प्रयास जारी हैं। इसी का परिणाम है कि बड़ी संख्या में प्रतिवर्ष चोरी के मुकदमों में एफआर लगती है। इसी वर्ष पिछले छह माह में दर्ज चोरी के 666 मुकदमों में से 580 में पुलिस ने एफआर लगाई है।
चोरी से जुड़े मुकदमों को लेकर साफ है कि बाइक चोरी के अधिकतर मामलों में बाइक बरामद न होने पर पीड़ित बीमा क्लेम लेता है। उसके मुकदमे को एफआर करने पर ही क्लेम लिया जाता है। इसके चलते उनसे जुड़े मुकदमों में एफआर अधिकांश लगती है। इसी तरह चोरी के अन्य मुकदमों में पुलिस स्तर से माल बरामद न होने की दशा में लंबे प्रयास के बाद एफआर लगाई जाती है।
दूसरा यह भी होता है कि किसी एक घटना के संबंध में चोरी के आरोपी पकड़े गए तो फिर आसपास की कई घटनाएं उन्हीं पर खोल दी जाती हैं। हालांकि, उन घटनाओं से संबंधित माल बरामद नहीं होता। बस अपराधियों की स्वीकारोक्ति काफी रहती है। इसी तरह की गवाही अपने जिले के पिछले तीन वर्ष के आंकड़े दे रहे हैं।
अलीगढ़ जिले में चोरी के मुकदमों में माल बरामदगी का प्रतिशत भी बहुत अच्छा है। प्रदेश स्तर पर इसकी तारीफ हुई है। हां, जिन मुकदमों में माल का ब्योरा नहीं मिल पाता या सही तथ्य सामने नहीं आते। या रंजिशन मुकदमे लिखवाए जाते हैं। उनमें साक्ष्य के अभाव में एफआर लगाना लाजमी होता है। -संजीव सुमन, एसएसपी