शब्दों की जगह इशारे... खिलौनों की ओर ज्यादा आकर्षण... अपनी ही दुनिया में व्यस्त रहने की आदत। बच्चों में दिखने वाले ऐसे संकेतों को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है। ऐसे संकेतों वाले बच्चों की बीमारी को ऑटिज्म कहते हैं।
इन बच्चों की खामोशी जेएन मेडिकल कॉलेज के डिस्ट्रिक्ट अर्ली इंटरवेंशन सेंटर (डीईआईसी) में खास थेरेपी से तोड़ी जा रही है। वर्ष 2018 में स्थापित इस सेंटर में 20 हजार से ज्यादा बच्चे पंजीकृत हैं। हर महीने 500 से ज्यादा बच्चे आते हैं। सेंटर में दो प्ले स्टेशन भी है, जहां बच्चे अपने अंदाज में खेलते हैं। कभी स्लाइड करते हैं तो कभी बॉल पूल में चले जाते हैं। सेंटर के परामर्शदाता व स्पेशल एजुकेटर डॉ. मोहम्मद नौशाद ने बताया कि यहां ऑटिज्म से जूझ रहे बच्चों का उपचार किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि बच्चे के बोलने, सामाजिक संपर्क, प्रतिक्रिया या व्यवहार में लगातार अंतर दिखाई दे तो अभिभावकों को इंतजार करने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। समय पर पहचान और उचित थेरेपी बच्चों के संचार, सीखने और रोजमर्रा के कौशल के विकास में मदद कर सकती है। उन्होंने कहा कि सेंटर में विशेषज्ञ टीम है, जो बच्चों में देखते हैं कि उनमें कहां-कहां कमी है।
उसके बाद गतिविधियों का प्लान बनाकर अभिभावक को देते हैं, जो अपने बच्चों को करा सकें। हालांकि, इसमें थेरेपी बहुत जरूरी है, जिसे अनदेखी की जाती है। मनोवैज्ञानिक डॉ. फिरदौस जहां ने कहा कि सेंटर में आने वाले ऑटिज्म पीड़ित बच्चों का उपचार काउंसिलिंग एवं थेरेपी से किया जाता है।
मोबाइल की लती बच्चे भी पहुंच रहे सेंटर
सेंटर में ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे आते हैं। इनमें करीब 10 फीसदी बच्चे ऐसे भी होते हैं, जो मोबाइल की लती होते हैं। इन बच्चों को उनके अभिभावक यहां सेंटर में खेलने के लिए लाते हैं, जिससे वह मोबाइल से दूर रहे। मनोवैज्ञानिक डॉ. फिरदौस जहां के अनुसार, कुछ अभिभावक बताते हैं कि मोबाइल छीनने पर उनका बच्चा हिंसक हो जाता है।
केस- 1 : बच्चे में आया 90 फीसदी तक सुधार
अंजलि ने बताया कि वह बच्चे के साथ दो साल से सेंटर में आ रही हैं। पहले उनका बच्चा कोई बात नहीं समझ पा रहा था और न ही कोई जवाब दे पा रहा था, लेकिन अब 90 फीसदी तक सुधार है।
केस-2 : बच्चों से घुलता-मिलता नहीं था बच्चा
डॉ. आसिफ ने बताया कि उनका बच्चा आई कॉन्टेक्ट नहीं कर पा रहा था। वह अन्य बच्चों से घुल-मिल नहीं पाता था। सेंटर में आने पर अब बच्चे में सुधार है। वह पहले से बेहतर हो रहा है।
केस-3 : बेटी की तबीयत में सुधार
शबीना ने बताया कि उनकी बच्ची को बोलने में दिक्कत होती थी। वह टायलेट के बारे में नहीं पता पाती थी, लेकिन जब यहां इसे दिखाया और इलाज शुरू हुआ, अब बेटी में काफी ज्यादा सुधार है।