आतंकी घटनाओं व देशविरोधी गतिविधियों में फंडिंग को लेकर सुर्खियों रहने वाले संगठन पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) देश भर में सुर्खियों में है। ऐसे किसी भी संगठन को लेकर देश में गतिविधि हो और अपने शहर से उसके जुड़ाव पर चर्चा न हो, ऐसा संभव नहीं। हालांकि आधिकारिक तौर पर न तो अभी कोई निर्देश मिला और न टीम यहां पहुंची, मगर पीएफआई के अलीगढ़ कनेक्शन को कोई नकार नहीं रहा। समय-समय पर ऐसे संकेत मिलते रहे हैं कि अलीगढ़ में सिमी की स्थापना और उस पर प्रतिबंध के बाद सिमी के सक्रिय व युवा सदस्य आतंकी संगठन आईएम और पीएफआई से जुड़ गए हैं। सीएए-एनआरसी के विरोध में अलीगढ़ में लंबे समय तक चले विरोध-प्रदर्शन और उपद्रव में भी पीएफआई से फंडिंग के सुराग हाथ लगे थे। कुछ लोगों का एजेंसियों/पुलिस टीमों ने आगरा व फिरोजाबाद तक पीछा किया था। इसके बाद पीएफआई की सक्रियता अपने शहर में कभी सामने नहीं आई। पहले से शहर देशविरोधी गतिविधियों को लेकर बदनाम है, इसलिए कोई भी किसी भी सक्रियता को नकारता नहीं है।
सिमी सर्वेसर्वा को 19 वर्ष बाद खोज पाई थी दिल्ली पुलिस
2008 में अहमदाबाद बम धमाकों के बाद आजमगढ़ के सरायमीर बीनापारा का आईएम का खास सदस्य अबु बशर अलीगढ़ पहुंचा और एक रात यहां रुकने के बाद यहां से चला गया। बाद में इस कांड के मुख्य साजिशकर्ता सफदर नागौरी के अलीगढ़ कनेक्शनों का भी इनपुट मिला। इन्हीं इनपुट पर काम करते हुए 5 दिसंबर 2020 को दिल्ली स्पेशल सेल ने सिविल लाइंस इलाके से एक बुजुर्ग व्यक्ति अब्दुल्ला को गिरफ्तार किया था। इसकी पहचान 19 साल से फरार सिमी के सक्रिय सदस्य के रूप में हुई। बतौर उर्दू व फारसी अनुवादक के रूप में पहचान रखने वाले अब्दुल्ला ने वर्ष 1985 में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से अरबी में एमए किया था। उसे सिमी की मैगजीन के हिंदी वर्जन का संपादक बनाया गया। बाद में वह दिल्ली जामिया नगर में जाकर बस गया। दिल्ली से फरार होने के बाद वह अलीगढ़ आ गया। उसकी गिरफ्तारी के समय वह दोदपुर में परिवार के साथ किराये पर रहता था। उजागर हुआ था कि ब्लास्ट के बाद अबु बशर जब अलीगढ़ आया तो अब्दुल्ला के घर में रुका था। चूंकि सक्रियता कम थी, इसलिए खोजने में देरी हुई।
ये है सिमी का अलीगढ़ से जुड़ाव, मुख्यालय पर 2001 से ताला
स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) की स्थापना जमात-ए-इस्लामी की छात्र इकाई के रूप में अप्रैल 1977 में अलीगढ़ में हुई। उस समय शमशाद मार्केट पर कार्यालय बनाकर प्रो. मो. अहमदुल्लाह सिद्दीकी ने इसे खड़ा किया। इसे एसआईओ (स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाइजेशन) का दूसरा रूप बताया गया। जैसे-जैसे देश में सांप्रदायिक घटनाओं और देश विरोधी गतिविधियों में 1984 के बाद सिमी कार्यकर्ताओं के नाम सामने आने लगे तो 2001 में प्रतिबंध के बाद से वहां ताला लग गया। हालांकि 2008 में अल्प समय के लिए प्रतिबंध हटा, लेकिन वह फिर बरकरार हो गया। इसके आखिरी राष्ट्रीय अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही को प्रतिबंध के बाद जेल गए और रिहा होने के बाद वह आजमगढ़ में अपना क्लीनिक चलाने लगे। शमशाद मार्केट मुख्यालय पर आज भी ताला लगा है और खुफिया निगरानी रहती है। खास बात यह है कि जो उस समय के सक्रिय सदस्यों की सूची खुफिया तंत्र के पास थी, उनमें ज्यादातर या तो बुजुर्ग हो गए हैं, या फिर उनकी सक्रियता खत्म हो गई। कुछ इसके कटरपंथी ग्रुप इंडियन मुजाहिदीन व अब आकर पीएफआई से जुड़कर काम करने लगे थे।
इन वजहों से अलीगढ़ रहा रडार पर
- सिमी की स्थापना के साथ-साथ यहां उसका मुख्यालय होना।
- कश्मीर से आने वाले कपड़ों में 1992 में एके-47 छिपाकर लाना।
- एके-47 मिलने के बाद 35 वर्ष से फरार आतंकी का आज तक सुराग नहीं।
- नागौरी द्वारा अलीगढ़ की मदद से ब्लास्ट प्लान करने के साक्ष्य मिलना।
- अहमदाबाद ब्लास्ट के बाद आतंकी का अलीगढ़ रुककर जाना।
- कानपुर धमाकों के बाद एनकाउंटर में मारे व पकड़े आतंकी अलीगढ़ में रुके थे।
- होशंगाबाद में गिरफ्तार आतंकी द्वारा खुद को अलीगढ़ कोचिंग स्वीकारी।
- कश्मीर के छात्र मन्नान वानी द्वारा एएमयू में ही रहकर पढ़ाई करना।
- मन्नान वानी के भागने के बाद पकड़े शुभान ने अलीगढ़ रुकना स्वीकारा।
- फिर एकाएक आतंकी संगठन में शामिल होना, एन्काउंटर में मारा जाना।
- दोदपुर के फ्लैट से 21वर्ष बाद सिमी का एक सर्वेसर्वा पकड़ा जाना।
- वर्तमान में हो रही कार्रवाई को लेकर पीएफआई के अलीगढ़ कनेक्शन या टीम के अलीगढ़ आने को लेकर न तो कोई निर्देश मिला है और न टीम के यहां आने की सूचना है। ये अलग बात है कि पुराने समय में कभी इनपुट मिलते रहे हों। वर्तमान में हमारी टीमें इस विषय में लगातार सक्रिय हैं। हर गतिविधि पर नजर रखे हुए हैं।-कलानिधि नैथानी, एसएसपी