गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय बलिहारी गुरु आपने गोेविंद दियो बताय। गुरु का दर्जा ईश्वर से भी ऊपर बताया गया है। किसी भी बच्चे के भविष्य का वास्तविक निर्माता शिक्षक ही होता है। बच्चे में संस्कार शिक्षक द्वारा पैदा किए जाते हैं। शिक्षक दिवस पर कुछ ऐसे शिक्षकों की चर्चा जो बदलती स्थिति में भी अपनी भूमिका का बेहतर निर्वहन कर प्रतिभा की बगिया खिला रहे हैं।
डांस कंपटीशन में जलवा बिखरने वाला 7 वर्षीय देव आज जो कुछ हैं, वह अपने डांस गुरु गगन तिवारी की बदौलत हैं। खुद देव के परिजन इस बात को स्वीकार करते हैं। देव के पिता अमित वार्ष्णेय निवासी सराय दीनदयाल बताते हैं कि देव बचपन से दिव्यांग है।
1. बचपन से ही उसकी इच्छा डांस सीखने की थी, लेकिन उसकी दिव्यांगता को देखकर कोई भी डांस टीचर उसे डांस सिखाने को तैयार नहीं हुआ। ऐसे में जब एक डांस एकेडमी चलाने वाले गगन तिवासी को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने देव को डांस की ट्रेनिंग देनी शुरू की। बस फिर क्या था।
देव की सफलता का सिलसिला चल पड़ा। बड़े-बड़ी डांस प्रतियोगिताओं में देव ने धूम मचाई। पिछले दिनों उसने सोनी टीवी पर चल रहे सुपर डांसर में अंतिम 24 में जगह बनाकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। देव आज सफलता के इस मुकाम पर अपने गुरु गगन की बदौलत है तो गगन भी कहते हैं कि देव उन्हें लगातार गुरु दक्षिणा दे रहा है।
गगन को विश्वास है कि देव अभी और सफलता का झंडा बुलंद करेगा। अगले ऑडिशन में वही सफलता को चूमेगा। दिव्यांगता को उसने अपनी प्रतिभा पर हावी नहीं होने दिया।
2. एक ट्रेन दुर्घटना में दोनोें पैर गवां चुकी शिक्षिका मीना के जज्बे को सलाम। स्थानीय प्रेस कॉलोनी निवासी 28 वर्षीय मीना रानी के पिता ओमप्रकाश यहां गवर्मेंट प्रेस में कार्यरत हैं। मीना ने अलीगढ़ में ही एक इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की और उसके बाद गाजियाबाद के एक कॉलेज में पढ़ाने लगी।
वर्ष 2012 में एकाएक उन पर कयामत टूट पड़ी। गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर वर्ष 2012 में गाजियाबाद रेलवे स्टेशन पर ट्रेन की चपेट में आकर उनके दोनों पैर कट गए। मीना ने इसके बाद भी हिम्मत नहीं हारी। उनकी पूरी रुचि अध्यापन में थी। इसलिए ऐसी स्थिति में भी उन्होंने बीटीसी किया।
उसके बाद उनका चयन बेसिक शिक्षा महकमे के सहायक अध्यापक के रूप में हो गया। आज वह रोजाना 18 किमी दूरी का सफर तय कर लोधा ब्लॉक के एक परिषदीय स्कूल में पढ़ाने के लिए जाती हैं। उनका कहना है कि बच्चों को पढ़ाने से उन्हें आत्म संतुष्टि मिलती है। शिक्षिका मीना खुद पैरों पर खड़ी हुई और अब बच्चों को शिक्षित कर उन्हें भी पैरोें पर खड़ा करने का काम कर रही हैं।