महेन्द्र निवासी मंजू देवी दो बेटों के साथ रहती हैं एक कमरे में।
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यह केस सिर्फ बानगीभर हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि किराए के कमरों में मुफलिसी के साथ वक्त काट रहे लोगों का प्रधानमंत्री आवास वाला सपना अधूरा ही रह गया है। पात्र होने के साथ लोगों ने आवेदन तो किए, लेकिन पक्की छत का नसीब हर किसी का नहीं था। इसीलिए आज भी लोग किराए के कमरों से ही अपना जीवन यापन कर रहे हैं।
2016 में आवेदन, चक्कर काटने के बावजूद नहीं मिला मकान
-मानिक चौक निवासी अनिल कुमार ने वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री आवास के लिए आवेदन किया था। अनिल कुमार ताले की एक फैक्टरी में मजदूरी का कार्य करते हैं। उन्होंने बताया कि आवेदन के बाद नगर निगम से एक बार फोन आया। वहां पहुंचे तो सूची में हमारा नाम शामिल था। यहां किराए और कमाई संबंधी जानकारी दी गई। इसके बाद कई चक्कर लगाए, लेकिन आज तक मकान नहीं मिला है। उन्होंने बताया कि परिवार में पत्नी व तीन बच्चे हैं। मकान का एक सपना देखा था, वह भी पूरा नहीं हुआ।
- महेंद्र नगर निवासी 60 वर्षीय मंजू वार्ष्णेय पत्नी रमेश चंद्र वार्ष्णेय ने बताया कि 2019 में उनके पति की मौत हो गई थी। अब उनके बाद 30 वर्षीय गौरव वार्ष्णेय व 28 वर्षीय अमित वार्ष्णेय के साथ महेंद्र नगर में किराए पर रहती हैं। मंजू ने बताया कि दोनों बेटे आइसक्रीम, कपड़े आदि बेचकर बमुश्किल 20 हजार रुपये कमा पाते हैं। 35 सालों से किराए पर रहे रहे हैं। मकान के लिए आवेदन किया था, लेकिन नहीं मिला. इतना ही नहीं पति की मौत के बाद अनुदान भी नहीं मिला. राशनकार्ड है, लेकिन विधवा पेंशन की भी सुविधा नहीं मिली। घर में सिलिंडर नहीं था तो रिश्तेदारों से पैसे लेकर चूल्हा जलाया था। परिवार में सिर्फ एक साइकिल है। इसके अलावा कुछ नहीं है। उन्होंने बताया कि जनप्रतिनिधि से लेकर अधिकारियों के चक्कर काटे, लेकिन मकान नहीं मिला।