1901 की जनगणना में अलीगढ़ जिले में राजपूतों की संख्या 91403 थी। यह हिंदुओं की कुल जनसंख्या का 8.84 फीसदी थी। अलीगढ़, सिकंदराराऊ और हाथरस में इनकी संख्या 20 हजार से ज्यादा थी। खैर को छोड़कर अन्य इलाकों में इनकी संख्या काफी कम थी। राजपूतों में जादोन बहुसंख्या में थी। इन्हें चंद्रवंशीय क्षत्रिय माना जाता है। इनकी संख्या 33232 थी। इनकी मौजूदगी जिले में सब स्थानों पर थी। लेकिन बड़ी संख्या अलीगढ़ में ही रहती थी। चौहानों की संख्या 18234 थी। चौहान मुख्यतः खैर, सिकंदराराऊ और अलीगढ़ में रहा करते थे। गहलोतों की संख्या 3195 और तोमर 2360 की संख्या में मौजूद थे। इन्हें भी राजपूतों की श्रेणी में ही रखा गया था।
वैश्य वर्ग में अग्रवाल और बारासैनियों की संख्या थी सबसे ज्यादा
वैश्य अथवा बनिया लोगों की भी संख्या उल्लेखनीय थी। इनका निवास जिले में सभी स्थानों पर था। 1901 में इनकी संख्या 45649 थी। यह हिंदुओं की कुल संख्या का 4.38 फीसदी थी। इनकी भी कई उपजातियां थीं। इनमें सबसे ज्यादा अग्रवाल थे जिनकी संख्या 17126 थी। सिकंदराराऊ में अग्रवालों की मौजूदगी बेहद कम थी। यहां वैश्यों में बारासैनियों की संख्या सबसे ज्यादा 9379 थी। माहेश्वरी लोगों की संख्या 2380 थी। इनमें से ज्यादातर लोग जिले के दक्षिणी हिस्से में रहते थे। अग्रवाल और बारासैनी बिरादरी के लोगों का दावा था कि वे अलीगढ़ में पंजाब के अग्रोहा जिले से पलायन करके आए थे। अग्रोहा को शहाबुद्दीन गोरी ने तहस-नहस कर दिया था।
अन्य जातियां
जिले की अन्य जातियों में सबसे ज्यादा उल्लेखनीय संख्या लोध लोगों की थी। इनकी संख्या 39660 गिनी गई थी। इनकी गिनती मेहनतकश और कुशल किसानों में की जाती थी। ये लोग मुख्यतः अतरौली, कोल और अकराबाद में रहा करते थे। कई लोगों के पास जमींदारी भी थी। इसके अलावा जिले में गड़रिया 36105, कोरी 34030, कहार 32781, अहीर 26307 की संख्या में थे। सफाई कर्म से जुड़े लोगों की संख्या 26846 थी। नाई 25259, काछी 22398 संख्या में थे। खटिकों की संख्या 20808, कुम्हारों की 19368, धोबी 13609, कायस्थ 9322, माली 8207 धुनिया 7675 की संख्या में थे।
(जारी)
स्रोतः अलीगढ़ गजेटियर 1909