यह बात सौ आने सच है, जो परिस्थितियां कोरोना काल के बाद उपजी हैं, उनसे निपटना चुनौतीपूर्ण है। मगर इन चुनौतियाें से पार पाना संभव है। लंबे अंतराल के बाद स्कूल पहुंचने वाले बच्चों की मनोदशा बदली हुई होगी। दरअसल, चार अप्रैल से नया सत्र शुरू होने वाला है। ऐसे में अभिभावकों व शिक्षकों को बच्चों से दोस्ताना व्यवहार रखना होगा ताकि वह स्कूल में खुद को अकेला न महसूस करें और नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल सकें।
कोरोना काल के बाद यूपी सरकार के आदेश पर सितंबर से कक्षा नौ से 12 तक स्कूल खुल गए थे। बच्चों का आना भी शुरू हो गया था। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य कक्षाओं के बच्चे भी आने लगे। लेकिन चार अप्रैल से शुरू हो रहे नए सत्र से सभी कक्षाओं के बच्चे स्कूल आएंगे तो उनके हाव-भाव बदले होंगे। ऐसे में शिक्षकों व अभिभावकों की जिम्मेदारी होगी कि वह बच्चों का ध्यान रखें।
यह बात सही है कि कोरोना काल में बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ा था, जिन शिक्षण संस्थानों के पास ऑनलाइन पढ़ाई की ज्यादा सुविधाएं थीं, वहां पढ़ाई गतिमान रही। जब स्कूल खुले तो पढ़ाई फिर पटरी पर आने लगी। यह सिलसिला नए सत्र में भी जारी रहेगा।
- डॉ. चंद्रशेखर शर्मा, शिक्षक, ब्रिलिएंट पब्लिक स्कूल
कोरोना काल के दो साल के बाद स्कूल खुले। अब ऑफलाइन पढ़ाई शुरू हो गई। बच्चे स्कूल आने लगे। उनमें उत्साह रहा। अब नए सत्र में पढ़ाई अपने उसी शिखर को छुएगी, जैसे कोरोना काल से पहले थी। खेल मैदानों में बच्चे खिलाड़ी के रूप में खेलेंगे और आगे बढ़ेंगे।
- एसएम राशिद, शिक्षक, अलबरकात स्कूल
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कोरोना काल में बच्चों की पढ़ाई ज्यादा नहीं हो पाई। ऑनलाइन पढ़ाई ऑफलाइन का ठोस विकल्प नहीं हो सकता। ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था कि इस कोरोना महामारी से निजात दिलाएं। जनजीवन पटरी पर आए। अब स्कूल खुल गया है। इससे खुश हूं।
-शेखर वार्ष्णेय, अभिभावक
दावे के साथ कह सकता हूं कि जो क्लास रूम में पढ़ाई होती है, उसका कोई जोड़ नहीं है। ऑनलाइन पढ़ाई तो बच्चा कर ही रहा था, लेकिन मैं स्कूल खुलने का इंतजार कर रहा था। जैसे ही स्कूल खुला, मैंने बच्चे को भेज दिया। नए सत्र में भी यह क्रम जारी रहेगा।
-पीयूष, अभिभावक
कोरोना काल के बाद जब स्कूल खुला, तो बहुत खुशी हुई थी, क्योंकि घर पर रहकर पढ़ाई पर असर पढ़ रहा था। सोच रहा था कि कब अपने दोस्तों और शिक्षकों से मिलूंगा। पढ़ूंगा और खेलूंगा। स्कूल खुलने से बहुत खुश हूं। नए सत्र में पढ़ने आऊंगा।
- आर्यन, कक्षा पांच, हेरिटेज इंटरनेशनल स्कूल
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सितंबर से नियमित बच्चे स्कूल आ रहे हैं। सुखद यह है कि जो वार्षिक परीक्षा हुई, उसमें नर्सरी से कक्षा 12 तक के सभी विद्यार्थियों ने ऑफलाइन परीक्षा दी, जिन बच्चों की तबियत खराब थी, उन्होंने दो-चार दिन के बाद परीक्षा दी। मैंने अभिभावकों की काउंसिलिंग की थी। उन्हें भरोसा दिलाया था कि बच्चों को ऑफलाइन परीक्षा देने दें। भले ही उसे कम नंबर मिले या पासिंग मार्क लाए। कम से कम वह अपना पेपर तो देगा, वह परिस्थितियों का मुकाबला करेगा।
- दीप्ति गोविला, प्रधानाचार्या, डीएस बाल मंदिर स्कूल
अनुशासन का न बनाएं दबाव, सहनशीलता दिखाएं
कोरोना महामारी के चलते दो साल तक बच्चे घर रहे, जब वह स्कूल जाएंगे तो उनका रुटीन बदलेगा, क्योंकि अभी तक अपनी मर्जी से वह सो रहे थे, उठ रहे थे। अब बच्चों की अनुशासित वाली जिंदगी शुरू होने वाली है। लंबे समय बाद नए लोगों से मिलेंगे तो उनमें हिचक होगी और घबराएंगे भी। स्वभाव से बच्चे चिड़चिड़े हो गए हैं। वहीं, ऑनलाइन से ऑफलाइन मोड में आने पर शिक्षकों की भी मनोदशा बदली हुई होगी। बच्चों को एकाग्रचित होने में थोड़ा समय लगेगा। अभिभावकों को भी अलग रुटीन बनाना होगा। खेलने के लिए उन्हें बाहर भेजें और स्कूल में जो काम मिलता है, दबाव न बनाकर उसे धीरे-धीरे पूरा कराएं। अभिभावकों की ड्यूटी है कि वह बच्चों पर पूरा ध्यान दें। यह भी देखना होगा कि बच्चों के स्वभाव में क्या बदलाव आ रहा है। उदासी और चिड़चिड़ापन तो नहीं है। बच्चा अपनी बात कह पा रहा है या नहीं। बच्चा डरा-डरा तो नहीं है। टीचर को भी सहनशीलता दिखानी होगी कि उन्हें बच्चों के साथ नरमी बरतनी होगी। होम वर्क थोड़ा-थोड़ा दें। ज्यादा अनुशासन में रखने का दबाव न बनाएं। उसे कठोर दंड न दें। उसके माता-पिता से भी बात करें।
- डॉ. पूनम बत्रा, मनोवैज्ञानिक सलाहकार
शेखर वार्ष्णेय- फोटो : CITY OFFICE
दीप्ति गोविला- फोटो : CITY OFFICE