श्री वार्ष्णेय महाविद्यालय के बाहर साइलेंस जोन गुल है और शोर फुल है। नियमानुसार, शिक्षण संस्थानों के चारों ओर 100 मीटर के दायरे में साइलेंस जोन होना चाहिए, यहां 50 डेसीबल से अधिक ध्वनि प्रदूषण नहीं होना चाहिए। लेकिन मंगलवार को यहां 110 डेसीबल का शोर परिसर में आ रहा था। ये हालात तब थे, जब सड़क पर सामान्य यातायात था। अगर जाम लग जाए तो आंकड़े और भी चौंकाने वाले होंगे। 110 डेसीबल के शोर से छात्र छात्राओं को सुनने में परेशानी होती है।
अमर उजाला शिक्षण संस्थाओं के इर्द-गिर्द होने वाले ध्वनि प्रदूषण को लेकर अभियान चला रहा है। कॉलेज में लॉ की मार्कशीट लेने आईं पुरातन छात्राओं ने बताया कि हॉर्न के शोर में पढ़ाई बाधित होती थी। शिक्षक पढ़ाते थे, लेकिन उनकी आवाज हम तक नहीं पहुंचती थी, जिससे विषय को समझने में दिक्कत होती थी। छात्राओं ने दावा किया कि इसी के चलते कई बच्चे फेल भी हो गए। यहां पर अंतिम वर्ष की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों ने बताया कि पढ़ाई नहीं हो पा रही है। पूरे लेक्चर में 50 प्रतिशत भी समझ में नहीं आता है।
15 हजार वाहन गुजरते हैं प्रतिदिन
छर्रा अड्डा पुल से अनुमानित एक दिन में 15 हजार वाहन गुजरते हैं। इनमें से 10 प्रतिशत वाहनों पर हाई प्रेशर और म्यूजिकल हॉर्न होता है। जाम लगने पर शोर इतना तेज हो जाता है कि कक्षाओं में ठीक से सुनाई भी नहीं देता है। तेज ध्वनि वाला सायरन बजता है तो शिक्षक पढ़ाई रोक देते हैं।
110 डेसीबल का शोर कक्षाओं में पहुंच रहा है तो भयावह स्थिति
- अगर 110 डेसीबल का शोर कक्षाओं में पहुंच रहा है तो यह भयावह है। इससे न सिर्फ पढ़ाई बाधित होगी, बल्कि सुनने की क्षमता भी कम होने लगती है। अगर 110 डेसीबल का हॉर्न लगातार कानों के पास बजाया जाए तो इससे बहरापन भी हो सकता है। मैंने देखा है कि लोग अलग से हाई प्रेशर अथवा म्यूजिकल हॉर्न लगवा लेते हैं। अलग से लगवाने वाले हॉर्न में शोर बहुत ज्यादा होता है। इतना कि सुनते ही चिड़चिड़ाहट महसूस होने लगेगी। - डॉ. नरेश शर्मा, ईएनटी (नाक-कान-गला) विशेषज्ञ व सीएमओ, जेएन मेडिकल कालेज।
बच्चे मानसिक रूप से परेशान रहते हैं : प्रो. अतुल
- वास्तव में बाहरी शोरगुल से सब परेशान हैं, बच्चे पढ़ नहीं पाते हैं, हम पढ़ा नहीं पाते हैं। आलम यह है कि लेक्चर का समय खत्म हो जाता है, लेकिन बच्चे कुछ समझ नहीं पाते हैं। ऐसे में परीक्षा के समय बच्चे मानसिक रूप से परेशान रहते हैं। अलग से कक्षाएं लगानी पड़ती हैं। - अतुल अरोरा, असिस्टेंट प्रोफेसर, विधि विभाग एसवी कालेज।
पुरातन छात्राओं का छलका दर्द
- एसवी कॉलेज के विधि विभाग से तीन साल में लॉ की डिग्री की पूरी की है। पहले वर्ष इतनी दिक्कत नहीं हुई लेकिन दूसरा और तीसरा साल काफी बुरा निकला। भविष्य दांव पर लग गया, कई छात्र फेल भी हो गए। शिक्षक जो पढ़ाते थे, आधे से ज्यादा समझ में ही नहीं आता था। इसका कारण है वाहनों के हॉर्न का शोर। - दर्शन कुमारी, पुरातन छात्रा।
- एसवी कॉलेज के विधि विभाग से तीन साल का अनुभव अच्छा था। लेकिन बाहरी शोरगुल ने काफी परेशान किया। कक्षाओं में हद से ज्यादा शोर पहुंचता है। इससे न सिर्फ चिड़चिड़ाहट का स्वभाव आया, बल्कि शोर के चलते जो नहीं पढ़ सके, वह फेल हो गए। अब हमारे जूनियर इस समस्या को झेल रहे हैं। - काजल साहू, पुरातन छात्रा।
मॉनीटरिंग और चेकिंग कराई जाएगी
- सड़क सुरक्षा सप्ताह में लोगों को यातायात नियमों के प्रति जागरूक किया जा रहा है। शहरी आबादी में प्रेशर हार्न प्रतिबंधित हैं। भारत में पहले से ही कानून बना है कि अस्पताल, कोर्ट, कचहरी, शिक्षण संस्थान साइलेंस जोन में आते हैं। अमर उजाला द्वारा शिक्षण संस्थानों में पहुंच रहे शोर का, जो मुद्दा उठाया जा रहा है। उन इलाकों में विशेष तौर पर ध्यान देकर मॉनीटरिंग और चेकिंग कराई जाएगी। यहां हॉर्न न बजाने के लिए लोगों को जागरूक भी किया जाएगा। - सतीश चंद्र, पुलिस अधीक्षक यातायात।