फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सूनी हुई नीरज की जनकपुरी

Fri, 20 Jul 2018 03:01 AM IST
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
विज्ञापन
gopal das neeraj
विज्ञापन
 गोपाल दास ‘नीरज’ के निधन से उनकी जनकपुरी सूनी हो गई। करीब सात दशक से नीरजजी का जनकपुरी स्थित आवास साहित्य प्रेमियों के लिए तीर्थ स्थल बना रहा। एम्स में अंतिम समय में उनके पास उनके बेटे मिलन प्रभात गुंजन, उनकी पुत्र वधु रंजना सक्सेना और परिवार के अन्य सदस्य थे। नीरज के निधन की सूचना मिलते ही उनके अमेरिका में  रह रहे पौत्र पल्लव नीरज वहां से भारत के लिए रवाना हो गए  हैं। पुत्र वधु रंजना सक्सेना ने बताया कि शनिवार को नीरज जी का पार्थिव शरीर अलीगढ़ लाया जा रहा है। 
विज्ञापन


  शनिवार को ही उनका अंतिम संस्कार के रूप में शरीर का दान जेएन मेडिकल कॉलेज को किया जाएगा। उनकी पुत्र वधु रंजना  सक्सेना ने बताया कि एम्स में वह वेंटीलेटर पर ही थे, तब वह ज्याद कुछ नहीं बोल  पा रहे थे, लेकिन मेरे वहां पहुंचते ही आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया और नम आंखों से देखने लगे। उनके निधन की सूचना पाकर राजनीतिक, साहित्य, कला और फिल्मी दुनिया की दिग्गज हस्तियों ने शोक व्यक्त किया है। अलीगढ़ से भी कई राजनीतिक और सामाजिक हस्तियां शोक व्यक्त करने दिल्ली रवाना हो गई हैं। 125 से भी ज्याद फिल्मों में गीत लिख चुके नीरज को 1970 में फिल्म ‘चदा और बिजली’ के लिए लिखे गीत ‘काल का पहिया घूमे रे भैया’ के लिए उस वर्ष का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था। इसके अलावा तीन बार वह फिल्म फेयर पुरस्कार के लिए नामित भी हुए।
यह उनकी जीवनी

गोपाल दास सक्सेना‘नीरज’ का जन्म 4 जनवरी 1925 को जिला इटावा की महेवा कस्बे के गांव पुरावली में हुआ।  उस समय यह हिस्सा ब्रिटिश भारत के संयुक्त प्रांत था। जिसमें आगरा और अवध शामिल थे और जिसे अब उत्तर प्रदेश कहा जाता है। पिता बाबू ब्रज किशोर सक्सेना का निधन उस समय हो गया जब नीरज केवल सात वर्ष केे  थे। नीरज के परिवार में उनके पुत्र मिलन प्रभात गुंजन और पुत्रवधू हैं। जो हरिद्वार रहते हैं। नीरज अलीगढ़ के मंगलायतन विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी रहे। सात दशक से लंबी अपनी काव्य यात्रा में नीरज ने न सिर्फ हिंदी साहित्य अर कवि सम्मेलन बल्कि फिल्मों में भी गीत लिखे। फिल्मी गीतों में भी नीरज के कवित्व को जिंदा रखा।
विज्ञापन


यही कारण था कि यह गीत न सिर्फ बेहद लोकप्रिय हुए बल्कि साहित्यिक दृष्टि से भी बेहद उत्कृष्ट माने गए। नीरज का शुरुआती जीवन बेहद संघर्ष भरा रहा। इटावा की अदालत में  टाइपिस्ट की नौैकरी की तो सिनेमा हाल में भी नौैकरी की। बेकारी और फाकेमारी भी झेली। दिल्ली गए तो वहां सफाई विभाग में टाइपिस्ट का काम किया। यहां से कानपुर डीएवी कालेज में क्लर्क रहे। बाल्कट ब्रदर्स कंपनी (जो अब वोल्टास है) में पांच साल तक टाइपिस्ट का काम किया। नौकरी के साथ ही नीरज ने प्राइवेट परीक्षा देकर इंटर, बीए और 1953 में हिंदी साहित्य में एमए किया वह भी प्रथम श्रेणी के साथ। मेरठ में हिंदी विभाग में प्रवक्ता बतौर काम किया। वहां से इस्तीफा देकर अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक  हो गए। यहीं अलीगढ़ के मोहल्ला जनकपुरी में मकान बनाया और रहने लगे। 

कवि सम्मेलनों में लोकप्रियता बढ़ी तो फिल्म निर्देशकों का ध्यान भी इस ओर गया। अलीगढ़ के फिल्म निर्माता आर चंद्रा (प्रसिद्ध अभिनेता भारत भूषण के बड़े भाई) अपने बेटे के लिए फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ बना रहे थे। इसमें नीरज का गीत ‘कारवां गुजर गया’ शामिल किया गया। इस तरह माया नगरी में नीरज के सफर की शुरुआत हुई।  इसके बाद नीरज ने देवानंद, राज कपूर, मनोज कुमार सहित दिग्गज फिल्म निर्देशकों के साथ काम किया और बेहद कामयाब पारी खेली। सबसे ज्यादा लंबे समय तक नीरज ने देवानंद के लिए काम किया। देवानंद की पहली निर्देशित फिल्म ‘प्रेम पुजारी’(1971) से लेकर आखिरी निर्देशित फिल्म ‘चार्जशीट’ (2011) में नीरज ने ही गीत लिखे। साहित्य और कविता के क्षेत्र में योगदान के लिए भारत सरकार ने 1991 में उन्हें पद्मश्री और। सन 2007 में पद्मभूषण सम्मान से अलंकृत किया।

मुगल दरबार की आखिरी शमां के नाम से किया कवि सम्मेलन
 शहर में लगने वाली राजकीय औद्योगिक एवं  कृषि प्रदर्शनी में होने वाले  कवि सम्मेलन के संयोजक नीरज ही रहे। वर्ष 2011 के अखिल भारतीय कवि सम्मेलन के लिए नीरज ने कुछ अलग करने का विचार किया। नीरज ने उस कवि सम्मेलन को मुगल दरबार की आखिरी शमां के नाम से आयोजन करने का फैसला किया। तय हुआ कि कवि सम्मेलन में जितने कवि  आएंगे उनकी वेशभूषा मुगल  शैली की होगी। इसी के अनुसार कवि आए और कविता पढ़ी। नीरज ने खुद बहादुर शाह जफर का गेटअप धारण किया। बहुत ही जबरदस्त कवि सम्मलेन हुआ। स्थानीय कवियों में व्यंग्यकार सुरेंद्र सुकुमार, हरीश बेताब आदि ने शिरकत की। दिलचस्प बात यह रही कि कवि सम्मेलन समाप्त होने के बाद दो कवि आपस में जाम लड़ा रहे थे। उन्हें यह बात कहते हुए सुना गया कि अच्छा है हम मुगल दरबार के दरबारियों के गेटअप मे हैं। अब हमें यह करते हुए कोई  पहचान ही नहीं पाएगा। 
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें