पाकिस्तान की जेल में बंद बादल बाबू ने माता-पिता से बात करते वक्त इस्लाम कबूलने की बात तो स्वीकारी। मगर अभी नाम नहीं बदला है। न ही उसने किसी कारी या मौलवी के समक्ष कलमा पढ़कर विधिवत तरीके से इस्लाम धर्म अपनाना बताया है। कृपाल सिंह बताते हैं कि हो सकता है कि उसने इस्लाम स्वीकारना किसी दबाव में कहा हो। इसीलिए अपना नाम न बदला हो।
नहीं करना चाहता था माता-पिता से बात
पिता के अनुसार अधिवक्ता ने अदालत से अनुमति लेकर बात कराना तय किया था। जिसके लिए तीस मिनट का समय मिला था। मगर निचली अदालत से यह अर्जी खारिज हुई थी। बाद में उच्च अदालत से अनुमति मिली थी। जिसमें पुलिस की मौजूदगी में माता पिता से बात कराने के लिए 30 मिनट का समय दिया था। पहले तो बादल बात करने को तैयार न था। मगर समझाने पर वह बात करने को राजी हुआ। इस दौरान 20 मिनट का समय तो नेटवर्क व व्यस्तता में ही निकल गया। किसी तरह दस मिनट वीडियो कॉल पर बात हो सकी है।
बेशक सना ने बादल से शादी से इंकार कर दिया। मगर आज भी वह उसके प्यार में पागल है। पिता से बातचीत में कहा कि जिस लड़की के लिए वह अपना सब कुछ छोड़कर आया हो उसके बिना जीवन की कल्पना मुमकिन नहीं। अपने पिता से कहा कि हो सकता है वह कभी उनके पास न लौटे और जीवनभर पाकिस्तान में ही रहे। वह सना को नहीं छोड़ सकता। उसने यहां तक कहा कि जरूरत पड़ी तो वह उसके लिए जान तक दे सकता है। बादल को अभी भी उम्मीद है कि जेल से छूटने के बाद वह अपने प्यार को पा लेगा। पिता ने कहा कि वह बस इतना ही कह सकते हैं कि उनका बेटा उनके पास लौटकर आ जाए।
बोले पिता-इस्लाम कबूलता तो बदलता नाम
कृपाल सिंह बताते हैं कि इस्लाम कबूलने की बात क्यों कही यह समझ से परे है। इस्लाम कबूलने वाले व्यक्ति को कारी के सामने कलमा पढ़ना होता है। कारी इस्लाम कबूलने वाले व्यक्ति को नया नाम देते हैं और उसे रजिस्टर में दर्ज करते हैं। लेकिन बादल के साथ जेल के अंदर ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं हुई।