फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अल्फिया-इरफान: गरीबी की कतरनों को सिलकर पिता बनाएगा बेटी को डॉक्टर, ख्वाब अब बन रहे हकीकत

Sun, 09 Jun 2024 04:52 PM IST
चमन शर्मा इकराम वारिस, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

इरफान खान पेशे से दर्जी हैं। उनकी बेटी अल्फिया ने नीट में 720 में से 691 अंक हासिल किए हैं, देश में उनकी रैंक 4260वीं है। इरफान की संघर्ष की कहानी भी किसी फिल्म पटकथा से कम नहीं है।
विज्ञापन
बेटी अल्फिया और पिता इरफान खान - फोटो : स्वयं
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अक्सर गरीबी की चादर को ओढ़कर अपनी किस्मत पर रोने की आदत कुछ लोगों की होती है, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो रोना नहीं रोते, बल्कि उससे निकलने की जद्दोजहद करते रहते हैं। इन्हीं में एक ऐसा शख्स है, जिसने गरीबी की कतरनों को सिल कर अपनी बेटी के ख्वाब को भी हकीकत में ढाला।

विज्ञापन


थाना सिविल लाइंस के आलम बाग गली नंबर-5 में एक किराये के मकान इरफान खान चार बच्चों और पत्नी के साथ रह रहे हैं। वह पेशे से दर्जी हैं। उनकी बेटी अल्फिया ने नीट में 720 में से 691 अंक हासिल किए हैं, देश में उनकी रैंक 4260वीं है। इरफान की संघर्ष की कहानी भी किसी फिल्म पटकथा से कम नहीं है। वे फिरोजाबाद जिले से वर्ष 1998 में अकेले अलीगढ़ आए थे और यहीं के होकर रह गए। यहीं शादी हुई और बच्चे भी हुए, लेकिन आर्थिक तंगी दूर नहीं हुई। इस तंगी को इस परिवार ने चुनौती के रूप में लेना शुरू कर दिया। 

दिक्कतें चाहे जितनी हो, लेकिन तालीम की डोर नहीं छोड़ेंगे। उम्मीद थी कि इसी से तरक्की की मंजिल तक पहुंचा जा सकता है। माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अपनी खुशियां कुर्बान करते रहे। जब अल्फिया नीट में सफल हो गई, तो परिवार में खुशियां छा गईं। इस खुशियों के साथ अच्छे दिन आने की उम्मीदें भी जग गईं। अल्फिया की छोटी बहन को एएमयू के 10वीं में 95 फीसदी अंक मिले हैं। छोटा भाई हाफिज-ए-कुरान हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

बेटी ने ख्वाब पूरे कर दिए : इरफान

अल्फिया के पिता इरफान खान ने कहा कि वह दुनिया में सबसे खुशनसीब पिता हैं, जिसकी बेटी ने उनके ख्वाब पूरे कर दिए हैं। घर और एक छोटी सी दुकान है, जो किराये पर है। दुकान में एक सिलाई मशीन भी है, जहां खुद कटिंग और सिलाई करते हैं। दिन में एक ही पैंट-शर्ट सिल पाते हैं। इसी से गुजर-बसर करते हैं। कभी-कभी सिलने के लिए कपड़े के न आने पर वह सब्जियां और फल भी बेचते हैं। उन्होंने कहा कि उनके लिए बच्चे ही असल पूंजी हैं। तरक्की के लिए केवल तालीम ही एक बेहतर रास्ता है। एएमयू से 12वीं में अल्फिया को 98 फीसदी अंक मिले थे, इसलिए एक कोचिंग सेंटर ने निशुल्क पढ़ाया था।

अम्मी कहतीं तुम पढ़ो, काम वह करेंगी : अल्फिया
अल्फिया ने कहा कि वह एक हृदय रोग विशेषज्ञ बनना चाहती हैं, जिसके लिए वह दिन-रात मेहनत कर रही हैं। उन्होंने कहा कि उन दिनों को नहीं भूल सकती, जब अब्बू उन्हें ई-रिक्शा में बैठाकर कोचिंग सेंटर भेजते थे। उनके पीछे साइकिल वह आते थे, क्योंकि आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी कि दोनों लोग ई-रिक्शा से आ और जा सकें। अम्मी ने कभी उनसे कोई काम नहीं कराया है, बल्कि वह कहतीं तो तुम पढ़ो। कभी शादी-विवाह में भी उन्हें नहीं भेजती। घरवालों ने खूब कुर्बानियां दी हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें