बिजौली में तैनात नर्स गीता बतातीं हैं कि वह कोरोना के समय पर दीनदयाल संयुक्त चिकित्सालय में कार्यरत थीं। उन्होने अपने 59 वर्ष के कार्यकाल में ऐसी हालत कभी नहीं देखी थी। उन्होने बताया कि जैसे ही वह अस्पताल पहुंचती थीं तो सिहर जाती थीं। गीता ने बताया कि कोरोना में उन्होने अपनों को भी खोया है लेकिन ड्यूटी के आगे वह अपनों के दुख में भी शामिल होने नहीं गईं थीं। चूंकि जो मरीज अस्पताल में भर्ती थे, उनके परिजन भी उनके पास नहीं थे। गीता मरीजों की परिजन बनीं और उनका हौंसला बढ़ाया।
घर वालों ने की चिंता, फिर दिया साथ
निजी संस्थान में नर्स के पद पर कार्यरत काजल सिंह कोरोना काल के समय जिला अस्पताल में तैनात थीं। उन्होने बताया कि जैसे ही घर में पता चला की बेटी की कोरोना के मरीजों की देखभाल में ड्यूटी लगी है उनको चिंता हुई। लेकिन जब काजल ने उन्हें समझाया तब परिजनों नें उनका साथ दिया। काजल ने कहा कि संक्रमितों से भरे अस्पताल में खुद को सुरक्षित रखना बेहद मुश्किल था, फिर भी उन्होने खुद को सुरक्षित रख मरीजों की देखभाल बखूबी की। उन्होने बताया पहली बार ड्यूटी लगने पर उनको चिंता हुई लेकिन सुरक्षा के व्यापक इंतजाम होने से वह चिंता दूर हुई।
परिवार की चिंता छोड़ मरीजों को दिया था हौंसला
मोहनलाल गौतम महिला चिकित्सालय में तैनात एलिस मोनिका बताती हैं कि कोरोना काल के खौफनाक मंजर को वह आज तक नहीं भुला पायी हैं। उन्होने कहा कि सिर्फ एक नर्स ही थीं जो उस समय कोरोना संक्रमितों के साथ रहकर उनका हौसला बढ़ाती थीं। एलिस मोनिका ने बताया संक्रमित होने के डर से कुछ दिन परिवार से भी अलग रहना पड़ा था। उन्होने कहा कि कोरोना के समय संक्रमितों के परिवार बन कर नर्सों ने ही उनको स्वस्थ्य किया था।